बांग्लादेश में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चिंताओं के लिए प्रशासनिक विफलताएं और नीतिगत खामियां जिम्मेदार: रिपोर्ट

बांग्लादेश में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चिंताओं के लिए प्रशासनिक विफलताएं और नीतिगत खामियां जिम्मेदार: रिपोर्ट


नई दिल्ली, 29 जनवरी। बांग्लादेश में आम चुनाव में अब महज दो सप्ताह का समय बचा है और इस बीच राजनीतिक माहौल बेहद गर्म हो गया है। चुनाव से पहले ही देश के भीतर राजनीतिक नेता, पर्यवेक्षक, मीडिया और नागरिक समाज के विभिन्न वर्ग प्रशासनिक विफलताओं और नीतिगत खामियों को लेकर खुलकर चिंता जता रहे हैं। राजनीतिक तनाव, धार्मिक असहिष्णुता, आर्थिक असुरक्षा और सिमटता नागरिक दायरा- ये सभी मिलकर गंभीर संकट का संकेत दे रहे हैं।

गुरुवार को ढाका ट्रिब्यून के एक संपादकीय में बांग्लादेश में “मीडिया स्वतंत्रता के सिमटने के चेतावनी संकेतों” पर चिंता व्यक्त की गई। अखबार ने हालिया घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि मीडिया संस्थानों पर लक्षित हमलों को लेकर और अधिक आक्रोश सामने आना चाहिए। संपादकीय में कहा गया, “जब मीडिया को सेंसरशिप, दबाव और डर के बिना काम करने की अनुमति मिलती है, तो नागरिक बेहतर रूप से सूचित होते हैं और सार्वजनिक विमर्श मजबूत होता है।”

देश का मीडिया कई आपस में जुड़ी समस्याओं को उजागर कर रहा है, धीमी होती अर्थव्यवस्था, बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता और उग्र राजनीतिक बयानबाजी, लैंगिक समानता के मोर्चे पर झटके, तथा मीडिया स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और कानून के समान प्रयोग को लेकर बढ़ती चिंताएं।

रिपोर्टों और संपादकीयों में ठहरी हुई आर्थिक वृद्धि, बढ़ती महंगाई और हालिया नीतिगत फैसलों से राहत न मिलने की बात कही गई है, जिससे चुनाव नजदीक आते ही परिवारों और कारोबारियों में बेचैनी बढ़ रही है।

चिंताओं को और बढ़ाते हुए मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि व्यापक दस्तावेज़ी धोखाधड़ी के कारण बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय साख को नुकसान पहुंच रहा है। ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, उन्होंने बांग्लादेश को “धोखाधड़ी का विश्व चैंपियन” तक कह दिया और कहा कि फर्जी प्रमाणपत्रों और पासपोर्ट के कारण विदेशों में नागरिकों को परेशानी हो रही है।

महिलाओं के मुद्दों पर भी राजनीतिक वादों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई की ओर ध्यान दिलाया जा रहा है। अधिकार कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा, समान वेतन, चाइल्डकेयर सुविधाओं, न्याय तक पहुंच और राजनीतिक जीवन में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी पर सवाल उठाए हैं।

ढाका स्थित द डेली स्टार ने लिखा कि 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनाव की ओर बढ़ते बांग्लादेश में, मतदाताओं का आधा हिस्सा होने के बावजूद महिलाएं अब राजनीतिक बयानबाजी से प्रभावित नहीं हो रही हैं। अखबार ने हाल में देखी गई भीड़ की हिंसा का भी जिक्र किया।

अखबार ने विभिन्न पेशों और पृष्ठभूमि की 20 महिलाओं से बातचीत के बाद बताया कि बढ़ती हिंसा, सिमटता नागरिक क्षेत्र, नौकरियों का नुकसान, आर्थिक असुरक्षा, महिलाओं के स्वास्थ्य की अनदेखी और महिला मामलों के सुधार आयोग की 423 सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डालने से वादों और अमल के बीच की दूरी और बढ़ गई है, जिसका खामियाजा महिलाओं को रोजमर्रा की जिंदगी में भुगतना पड़ रहा है।

इस बीच, चुनाव प्रचार और पार्टी बैठकों से जुड़ी रिपोर्टों में धार्मिक बयानबाजी और पहचान की राजनीति को प्रभावी चुनावी हथियार के रूप में उभरते हुए दिखाया जा रहा है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ भीड़ की हिंसा और लिंचिंग की घटनाएं लगातार सुर्खियों में हैं। दिसंबर में दीपू दास को फांसी पर लटकाकर जलाने की भयावह घटना ने दुनिया को झकझोर दिया था।
 

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