भुखमरी से अन्न आत्मनिर्भरता तक: स्वतंत्रता सेनानी सी सुब्रमण्यम की हरित क्रांति ने बदला भारत का भाग्य

हरित क्रांति के पिता सी सुब्रमण्यम: स्वतंत्रता सेनानी से हरित क्रांति के जनक तक


नई दिल्ली, 29 जनवरी। 30 जनवरी का दिन अपने आप में खास है। यह दिन उस विचार की शुरुआत है, जिसने भारत को भुखमरी से निकालकर खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की राह पर खड़ा किया। तमिलनाडु के पोलाची में जन्मे सी सुब्रमण्यम राजनेता होने के साथ-साथ उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने आजादी के लिए संघर्ष किया और आजाद भारत की नींव गढ़ी। भारत में 'हरित क्रांति के पिता' के रूप में पहचान रखने वाले सी सुब्रमण्यम का जीवन इस बात का उदाहरण है कि नीति, निष्ठा और दूरदृष्टि कैसे एक राष्ट्र का भविष्य बदल सकती है।

हम यह बात दावे के साथ कह सकते हैं कि सी. सुब्रमण्यम की राजनीति सत्ता की नहीं, सेवा की थी। खेतों से लेकर संसद के गलियारों तक, उनकी सोच का केंद्र हमेशा से आम भारतीय रहा। उनकी सबसे बड़ी पहचान हरित क्रांति रही, लेकिन उनका योगदान कृषि तक सीमित नहीं था। शिक्षा, उद्योग, विज्ञान, योजना, रक्षा, वित्त, संस्कृति और नैतिक सार्वजनिक जीवन, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जिस पर उन्होंने अमिट छाप न छोड़ी हो।

सी. सुब्रमण्यम का जन्म 30 जनवरी 1910 को तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के पोलाची में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा पोलाची में और उच्च शिक्षा मद्रास में प्राप्त करने के बाद उन्होंने 1932 में मद्रास विश्वविद्यालय से विधि की उपाधि ली। लेकिन, वकालत से पहले ही उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का मार्ग चुन लिया। इसी कारण उन्हें उसी वर्ष कारावास झेलना पड़ा। 1941 और फिर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनका जेल जाना इस बात का प्रमाण है कि वे स्वतंत्रता को केवल विचार नहीं, बल्कि कर्म मानते थे। वे कोयंबटूर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने, राज्य कांग्रेस कमेटी की कार्यकारी समिति में रहे और 1946 में संविधान सभा के सदस्य चुने गए। 1952 तक वे अंतरिम संसद के सदस्य भी रहे, यानी भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के निर्माण में उनकी भूमिका प्रत्यक्ष रही।

1952 में वे मद्रास राज्य (वर्तमान तमिलनाडु) विधानसभा के सदस्य बने और लगातार दस वर्षों तक सदन के नेता रहे। वित्त, शिक्षा और कानून जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाया। तमिलनाडु उन शुरुआती राज्यों में शामिल हुआ, जहां सभी बच्चों के लिए मुफ्त प्राथमिक शिक्षा लागू की गई। गरीब बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन योजना की शुरुआत में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। यह योजना न केवल पोषण का माध्यम बनी, बल्कि स्कूलों में नामांकन और उपस्थिति बढ़ाने का भी प्रभावी साधन सिद्ध हुई।

1960 के दशक में भारत गंभीर खाद्य संकट से जूझ रहा था। 1964 से 1967 के बीच खाद्य एवं कृषि मंत्री के रूप में सी. सुब्रमण्यम ने उच्च उपज वाले बीजों, उर्वरकों के गहन उपयोग और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को नीतिगत समर्थन दिया। 1972 में गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ और यहीं से हरित क्रांति का इतिहास लिखा गया। नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. नॉर्मन ई. बोरलॉग ने उनके योगदान पर लिखा कि कृषि में परिवर्तन लाने के लिए आवश्यक राजनीतिक निर्णयों में सी. सुब्रमण्यम की दूरदृष्टि को कभी कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। यह प्रशंसा बताती है कि वे केवल प्रशासक नहीं, बल्कि परिवर्तन के मार्गदर्शक थे।

लोकसभा सदस्य के रूप में उन्होंने इस्पात, खान, भारी उद्योग, खाद्य एवं कृषि, योजना, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, औद्योगिक विकास, वित्त और रक्षा जैसे अहम मंत्रालयों का नेतृत्व किया। उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना को बढ़ावा दिया, योजना मंत्री के रूप में विकास को दिशा दी और वित्त मंत्री के रूप में आर्थिक अनुशासन को मजबूती दी।

1979-80 में रक्षा मंत्री के रूप में भी उन्होंने जिम्मेदारी को पूरी गंभीरता से निभाया। सुब्रमण्यम की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा भी उल्लेखनीय रही। वे संयुक्त राष्ट्र, एफएओ और यूनेस्को से घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे। अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (मनीला) और सिम्मिट (मेक्सिको) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में उनका चयन भारत के लिए सम्मान की बात थी।

सुब्रमण्यम की पहचान देश में एक संस्था निर्माता के रूप में भी होती है। इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिकल साइंसेज और मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज की स्थापना उनके प्रोत्साहन और समर्थन से संभव हुई। 15 फरवरी 1990 को उन्होंने महाराष्ट्र के राज्यपाल का पदभार ग्रहण किया। सक्रिय राजनीति से सेवानिवृत्ति के बाद भी वे सार्वजनिक जीवन से दूर नहीं हुए। भारतीय विद्या भवन से उनका जुड़ाव गहरा रहा। वे इसके अध्यक्ष और भवन इंटरनेशनल के चेयरमैन रहे। स्वच्छ सार्वजनिक जीवन, चुनावी सुधार और प्रशासनिक नैतिकता पर उनके व्याख्यान आज भी प्रासंगिक हैं।

1988 में उन्हें अनुव्रत पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसकी पूरी राशि उन्होंने छात्रों के चरित्र निर्माण हेतु दान कर दी। वे कई पुस्तकों के लेखक थे, जिनमें भारतीय कृषि में नई रणनीति विशेष रूप से चर्चित रही। खेलों में उनकी रुचि उनके संतुलित व्यक्तित्व को दर्शाती है। वे राजनेता कम, राष्ट्र-शिल्पी अधिक थे।
 

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