अरविंद जोशी : रंगमंच से सिनेमा तक, एक संपूर्ण कलाकार की अमर विरासत

अरविंद जोशी: रंगमंच से सिनेमा तक, एक संपूर्ण कलाकार की अमर विरासत


नई दिल्ली, 28 जनवरी। 29 जनवरी की तारीख भारतीय सिनेमा और गुजराती रंगमंच के इतिहास में एक भावुक खालीपन की याद दिलाती है। इसी दिन, साल 2021 में अभिनेता, सह-निर्देशक और रंगमंच के मजबूत स्तंभ अरविंद जोशी इस दुनिया से विदा हो गए थे। हालांकि, एक कलाकार कभी वास्तव में विदा नहीं होता, वह अपने किरदारों, संवादों और मंच पर छोड़ी गई गूंज में हमेशा जीवित रहता है।

जयंती पर अरविंद जोशी को याद करना, उस दौर को याद करना है, जब अभिनय सिर्फ पेशा नहीं, साधना हुआ करता था।

मुंबई में जन्मे और पले-बढ़े अरविंद जोशी ने हिंदी फिल्म उद्योग में कदम रखने से पहले लगभग एक दशक तक थिएटर कलाकार के रूप में काम किया। रंगमंच ने उनके अभिनय को वह गहराई दी, जो बाद में सिनेमा के परदे पर साफ झलकती रही। गुजराती थिएटर को उन्होंने सिर्फ अपनाया नहीं, बल्कि जीवन भर थामे रखा।

'राहुकेतु', 'लेडी लालकुंवर', 'खेलंदो', 'बंशय्या', 'बरफ ना चेहरा', 'जल्दी कर कोई जोए जशे' जैसे नाटकों में उनका अभिनय आज भी थिएटर प्रेमियों के बीच मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।

अरविंद जोशी को व्यापक पहचान हिंदी फिल्मों से मिली। 1969 में आई फिल्म 'इत्तेफाक' से लेकर 1975 की कालजयी फिल्म 'शोले' और 1986 की सुपरहिट फिल्म 'नाम' में उन्होंने हर भूमिका को पूरी ईमानदारी से निभाया। हालांकि 'शोले' जैसे बड़े सिनेमा में उनकी भूमिका सीमित थी, लेकिन उनकी स्क्रीन प्रेजेंस दर्शकों को प्रभावित करने के लिए काफी थी। 'अपमान की आग', 'अब तो आजा साजन मेरे' और 'लव मैरिज' जैसी फिल्मों में वह मुख्य भूमिकाओं में नजर आए और अपने सधे हुए अभिनय से अलग पहचान बनाई।

अरविंद जोशी केवल हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं रहे। गुजराती फिल्मों में उन्होंने मुख्य भूमिकाएं निभाईं और क्षेत्रीय सिनेमा को नई मजबूती दी। 'गार्वो गारासियो', 'घेर घेर मतिना चूला', 'ढोला मारू', 'तड़का छाया', 'मेंडी रंग लाग्यो' और 'गोवलियो' जैसी फिल्मों में उनका अभिनय आज भी सराहा जाता है।

अरविंद जोशी का परिवार भी कला से गहराई से जुड़ा रहा है। उनके बेटे शरमन जोशी आज हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता हैं, जबकि बेटी मानसी जोशी भी अभिनय और कला जगत में सक्रिय रही हैं। जोशी परिवार की कई पीढ़ियों ने फिल्म और टीवी में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, जो अरविंद जोशी की मजबूत सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाता है।

अरविंद जोशी कभी शोर-शराबा या विवाद में नहीं रहे। उनका अभिनय सहज था, उनकी आवाज में रंगमंच की गूंज थी और उनके किरदारों में आम आदमी की सच्चाई थी।
 

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