शिक्षण संस्थानों में छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव नहीं होना चाहिए : वरिष्ठ अधिवक्ता आभा सिंह

Senior Advocate Abha Singh


मुंबई, 27 जनवरी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए दिशानिर्देश को लेकर देशभर में सवर्ण वर्ग के छात्रों की ओर से विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। प्रदर्शनकारी छात्रों की मांग है कि इस दिशानिर्देश को लेकर फिर से पुनर्विचार किया जाए।

आईएएनएस से बातचीत में वरिष्ठ अधिवक्ता आभा सिंह ने यूजीसी के नए दिशानिर्देश में किए गए बदलावों की वजहों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यूजीसी के नए दिशानिर्देशों में यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी शिक्षण संस्थान में एससी, एसटी और ओसीबी समुदाय से आने वाले छात्रों के साथ उनकी जाति के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं हो सके। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी शिक्षण संस्थान में छात्रों के इतर वहां काम करने वाले गैरशिक्षण कार्यों से जुड़े कर्मचारियों के साथ भी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हो।

उन्होंने कहा कि यूजीसी के इस नए दिशानिर्देश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अब गैर शिक्षण संस्थान से जुड़े कर्मचारी भी अगर जातिगत भेदभाव का सामना करते हैं, तो वो भी इस संबंध में शिकायत कर सकते हैं। इस संबंध में बाकायदा शिक्षण संस्थान में अलग से सेल बनाया गया है, जिसमें इस तरह की शिकायत की सुनवाई किए जाने की पूरी व्यवस्था की गई है। नई गाइडलाइन में एक बात अभी भी अस्पष्ट है कि अगर कोई झूठी शिकायत करता है, तो उसके खिलाफ किस तरह की कार्रवाई की जाएगी। नए दिशानिर्देश में भेदभाव की परिभाषा को व्यापक कर दिया गया है। इसमें अप्रत्यक्ष भेदभाव को भी जोड़ दिया गया है। ऐसे में इस बात की आशंका गहरा जाती है कि आगे चलकर इसका दुरुपयोग हो। इसी वजह से नए दिशानिर्देश को लेकर देशभर में विरोध-प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि विश्वविद्यालय में बनाई गई इक्विटी कमेटी में अगड़ी जाति का कोई भी प्रतिनिधित्व नहीं है। इस कमेटी में सिर्फ अनुसूचित जाति और महिलाओं का ही प्रतिनिधित्व है। मान लीजिए, इंस्टीट्यूट में पढ़ने वाले किसी बच्चे के खिलाफ जातिगत भेदभाव के संबंध में किसी भी प्रकार की शिकायत दर्ज होती है, तो उसे कैसे सुधारा जाए, इसे लेकर किसी भी प्रकार की व्यवस्था तैयार नहीं की गई है। नए दिशानिर्देश में एक दम से आरोपी को गुनाहगार के रूप में चित्रित करने का प्रावधान किया गया है। इस वजह से इसका दुरुपयोग किए जाने की आशंका बढ़ गई है।

उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि यूजीसी को एक बार सवर्ण वर्गों की शिकायतों को सुनना चाहिए। शिक्षण संस्थानों में छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव नहीं होना चाहिए। आईआईटी की एक सर्वे सामने आई, जिसमें यह कहा गया है कि एससी/एसटी समुदाय से आने वाले कई बच्चों ने सुसाइड किए हैं। ऐसे मामलों में बढ़ोतरी हुई है। यूजीसी के इस नए दिशानिर्देश में इस बात का प्रावधान नहीं किया जाएगा कि कैसे दुरुपयोग पर अंकुश लगाया जाए, तब तक सवर्ण समुदाय से आने वालों में इसे लेकर डर बना रहेगा। हमने देखा है कि आमतौर पर लोग कानूनों का दुरुपयोग करते हैं। मैं खुद एक वकील हूं। मैं इस बात को भलीभांति जानती हूं।

उन्होंने कहा कि यूजीसी को चाहिए कि वो पहले मामले से संबंधित सभी हितग्राहियों की शिकायत को सुने और उसे दूर करने की दिशा में कदम बढ़ाए। शिक्षण संस्थान में पढ़ने के लिए जाने वाले 18 साल के उम्र के बच्चे का दिमाग इतना परिपक्व नहीं होता है कि वो उस बात को समझ सके कि वो क्या बोल रहा है। हमारे पास एससी/एसटी के संबंध में पहले ही कानून है, तो ऐसे में हम कोई अतिरिक्त कानून लेकर आएंगे, तो इससे दुविधा की ही स्थिति पैदा होगी। इससे कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है।

बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे पर भी वरिष्ठ अधिवक्ता आभा सिंह ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सरकार ने जिस तरह से उनका निलंबन किया है, बिल्कुल ठीक किया है, क्योंकि जब तक आप सरकार में रहते हैं, तब तक आप सरकार के विरोध में नहीं जा सकते हैं। इसकी एक गाइडलाइन होती है, जिसे वो मानने के लिए बाध्य होते हैं। मैंने देखा है कि जब कई सरकारी अधिकारी रिटायरमेंट के करीब होते हैं, तो वो किसी राजनीतिक दल के करीब आते हैं, ताकि अपने लिए रिटायरमेंट प्लान तैयार तक सकें। इस तरह से वो सरकार की आलोचना करना शुरू कर देते हैं। इसे रोकने के लिए कोई गाइडलाइन जरूर लाई जाए।
 

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