बांग्लादेश चुनाव: हिंसा और धमकियों के बीच महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम

बांग्लादेश चुनाव: हिंसा और धमकियों के बीच महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम


ढाका, 27 जनवरी। बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से पहले महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और डराने-धमकाने की घटनाओं पर महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने संसद में महिलाओं के सार्थक और प्रभावी प्रतिनिधित्व की अपनी लंबे समय से चली आ रही मांग को एक बार फिर दोहराया है।

महिला संगठनों की मांगों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाना, उन सीटों के लिए मतदान प्रक्रिया में सुधार करना और राजनीतिक दलों द्वारा अधिक महिला उम्मीदवारों को टिकट देना शामिल है। स्थानीय मीडिया के अनुसार, ये मांगें मंगलवार को ढाका के जातीय प्रेस क्लब में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रखी गईं।

यह प्रेस वार्ता सामाजिक प्रतिरोध समिति (समाजिक प्रोटिरोध कमिटी) के बैनर तले आयोजित की गई, जिसमें 71 महिला, मानवाधिकार और विकास संगठनों का मंच शामिल है। इस मौके पर बांग्लादेश महिला परिषद की अध्यक्ष फौजिया मोसलेम ने कहा कि देश में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में प्रगति बेहद निराशाजनक रही है।

फौजिया मोसलेम ने चुनावी नामांकन के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि आगामी चुनाव में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी महज 4.2 प्रतिशत है, जिसे उन्होंने “अस्वीकार्य” करार दिया।

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने बांग्लादेश निर्वाचन आयोग (ईसी) से आगामी चुनाव से पहले पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था और लैंगिक संवेदनशील माहौल सुनिश्चित करने की मांग की। उनका कहना है कि यह जरूरी है ताकि सभी नागरिक- चाहे वे किसी भी लिंग, धर्म, जातीयता या सामाजिक वर्ग से हों, बिना डर के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें।

देश के प्रमुख अखबार द डेली स्टार के अनुसार, फौजिया मोसलेम ने कहा, “चूंकि चुनाव बेहद नजदीक है, इसलिए हम मीडिया के माध्यम से निर्वाचन आयोग के समक्ष अपनी चिंताओं और सुझावों को रख रहे हैं।”

उन्होंने महिला उम्मीदवारों की सुरक्षा, सांप्रदायिकता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा को प्रमुख चिंता का विषय बताया।

प्रेस वार्ता में एक्शनएड बांग्लादेश की महिला अधिकार एवं लैंगिक समानता टीम की प्रबंधक मोरियम नेसा ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संबोधित एक ज्ञापन पढ़कर सुनाया। ज्ञापन में कहा गया कि संसदीय चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला हैं और बांग्लादेश में लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए हुए आंदोलनों में महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका रही है।

इसके बावजूद, महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों, आदिवासी समुदायों और गरीब वर्गों को अक्सर चुनाव और शासन दोनों में पूर्ण नागरिक के बजाय केवल वोट बैंक बनाकर देखा जाता है।

समिति ने चुनावी माहौल को लेकर भी गंभीर चिंता जताई और कहा कि मतदान से पहले महिलाओं, अल्पसंख्यकों और वंचित समुदायों को निशाना बनाकर हिंसा और धमकी की घटनाएं सामने आ रही हैं।

बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव और जनमत संग्रह की तैयारी के बीच निर्वाचन आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि देश की 300 संसदीय सीटों पर कुल 1,981 उम्मीदवारों में से केवल 81 महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं, जो कुल का मात्र 4.08 प्रतिशत है। यह स्थिति महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने को लेकर किए गए बार-बार के वादों के बावजूद बनी हुई है।

महिला अधिकार संगठनों ने इस कम आंकड़े पर कड़ी आलोचना की है, खासकर जुलाई चार्टर के तहत किए गए उन वादों के बाद, जिनमें बांग्लादेश राष्ट्रीय सहमति आयोग की सिफारिशें शामिल थीं।

इस बीच, मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के सत्ता में आने के बाद से बांग्लादेश में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है। आलोचकों का कहना है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया से महिलाओं को बाहर रखना लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।
 

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