‘काश पिता यह सम्मान देख पाते’, पद्मश्री मिलने पर भावुक हुआ युमनाम जात्रा सिंह का परिवार

‘काश पिता यह सम्मान देख पाते’, पद्मश्री मिलने पर भावुक हुआ युमनाम जात्रा सिंह का परिवार


इंफाल, 26 जनवरी। मणिपुर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले महान नट संकीर्तन कलाकार उस्ताद युमनाम जात्रा सिंह को मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किए जाने पर उनके परिवार में गर्व और भावुकता का माहौल है। उनके बेटे युमनाम बिशंबोर ने कहा कि अगर उनके पिता आज जीवित होते तो उन्हें इस सम्मान पर अत्यंत गर्व और अपार खुशी होती।

बिशंबोर ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत करते हुए कहा कि भले ही उनके पिता इस ऐतिहासिक क्षण को देखने के लिए अब साथ नहीं हैं, लेकिन परिवार और उनके असंख्य शिष्यों को यह राष्ट्रीय पहचान मिलने पर गहरा संतोष और गर्व महसूस हो रहा है।

उन्होंने अपने पिता के जीवन और कला यात्रा को याद करते हुए बताया कि जात्रा सिंह ने बहुत कम उम्र में ही नट संकीर्तन सीखने में गहरी रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। उन्होंने कई गुरुओं से प्रशिक्षण लिया, और शुरुआती दौर में खेती से जुड़े होने के बावजूद, कला के प्रति अपना समर्पण कभी कम नहीं होने दिया। बाद में, उन्होंने औपचारिक प्रशिक्षण लेकर चोलोम और एशेई में डिप्लोमा हासिल किया। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू मणिपुर डांस एकेडमी (जेएनएमडीए) में विजिटिंग गुरु के रूप में भी सेवाएं दीं और अपने ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया।

अपने लंबे और समर्पित करियर के दौरान युमनाम जात्रा सिंह ने सैकड़ों छात्रों को प्रशिक्षण दिया और वे ऑल इंडिया रेडियो, इंफाल के एक अनुमोदित कलाकार भी रहे। कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अपने जीवनकाल में कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए, जिनमें मणिपुर स्टेट कला अकादमी अवॉर्ड और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड प्रमुख हैं। बिशंबोर ने कहा कि भारत सरकार द्वारा दिया गया पद्मश्री सम्मान न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे मणिपुर के लिए गर्व की बात है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि काश यह पहचान उनके पिता को उनके जीवनकाल में मिली होती।

बचपन से ही उनमें नट संकीर्तन के प्रति गहरी भक्ति थी, जो मणिपुर की एक विशिष्ट और आध्यात्मिक कला परंपरा है और वैष्णव दर्शन से जुड़ी हुई है।

नट संकीर्तन में धार्मिक गायन, पुंग (ढोल), करताल (झांझ), और मोइबुंग (शंख) के माध्यम से भगवान कृष्ण और राधा की दिव्य कथाओं का वर्णन किया जाता है, जिसे आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग माना जाता है। इस कला के वैश्विक सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने वर्ष 2013 में नट संकीर्तन को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था।

सात दशकों से अधिक लंबे अपने शानदार करियर में युमनाम जात्रा सिंह ने 1949 से ही देश के विभिन्न हिस्सों में नट संकीर्तन प्रस्तुत किया और मणिपुर की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया। अपने जीवनकाल में उन्हें एक दर्जन से अधिक बड़े सम्मान प्राप्त हुए, जिनमें 2013 का मणिपुर स्टेट कला अकादमी अवॉर्ड और 2023 का संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड शामिल है। 11 अक्टूबर 2025 को 102 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ मणिपुर के सांस्कृतिक जगत में एक ऐसी अपूरणीय क्षति हुई, जिसकी भरपाई संभव नहीं है, लेकिन पद्मश्री सम्मान के माध्यम से उनकी विरासत को देशभर में स्थायी पहचान मिल गई है।
 
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