हिंदी सिनेमा के 'लॉयन' : किताबें बेचकर मुंबई पहुंचे, सीमेंट की पाइपलाइन में बिताई कई रातें

हिंदी सिनेमा के 'लॉयन': किताबें बेचकर मुंबई पहुंचे थे अजीत खान, सीमेंट की पाइपलाइन में बताई थी कई रातें


मुंबई, 26 जनवरी। हिंदी सिनेमा की दुनिया में कई ऐसे नाम हैं, जिनका सफर खुद एक फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा। इन्हीं में एक नाम है अजीत खान, जिन्हें हिंदी सिनेमा का 'लॉयन' कहा जाता है। पर्दे पर रौबदार आवाज और आंखों में खौफ लिए खलनायक के रूप में नजर आने वाले अजीत का जीवन संघर्ष और त्याग से भरा रहा। बहुत कम लोग जानते हैं कि बॉलीवुड का 'लॉयन' बनने के लिए कभी उन्होंने अपनी किताबें तक बेच दी थीं।

अजीत का असली नाम हामिद अली खान था। उनका जन्म 27 जनवरी 1922 को हैदराबाद में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में फिल्मों को लेकर गहरी रुचि थी। पढ़ाई के साथ-साथ वह अभिनय की दुनिया के सपने देखा करते थे। उस दौर में फिल्मों में जाना आसान नहीं था। उनका इंडस्ट्री में न कोई गॉडफादर था और न ही उनके पास पैसे थे। इसके बावजूद अजीत ने तय कर लिया कि वह मुंबई जाकर सपनों को पूरा करेंगे।

जब उन्होंने मुंबई जाने का फैसला किया, तब उनके पास सफर के लिए भी पूरे पैसे नहीं थे। ऐसे हालात में अजीत ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपनी पढ़ाई की किताबें बेच दीं, ताकि मुंबई पहुंच सकें। किताबें बेचकर वह मायानगरी पहुंचे, लेकिन यहां मुश्किलें खत्म नहीं हुईं, बल्कि असली संघर्ष यहीं से शुरू हुआ।

मुंबई में शुरुआती दिनों में अजीत को रहने के लिए भी जगह नहीं मिली। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ समय तक उन्हें सीमेंट की पाइपलाइन में रहना पड़ा। बड़े शहर में अकेले, बिना पैसे और पहचान के टिके रहना आसान नहीं था, लेकिन अजीत ने हार नहीं मानी। वह छोटे-मोटे रोल करते रहे और इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने की कोशिश करते रहे।

साल 1946 में अजीत को फिल्म 'शाह-ए-मिस्र' में बतौर हीरो काम करने का मौका मिला। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में मुख्य अभिनेता के तौर पर काम किया, लेकिन वह पहचान नहीं मिली, जिसकी उन्हें तलाश थी। इसके बाद, अजीत ने विलेन के किरदारों को निभाना शुरू किया और यहीं से उनके करियर ने नया मोड़ ले लिया।

विलेन के रूप में अजीत ने हिंदी सिनेमा को एक नया अंदाज दिया। वह पर्दे पर शांत, स्टाइलिश और खतरनाक विलेन के रूप में सामने आए। उनके डायलॉग्स, बोलने का तरीका और आंखों की भाषा दर्शकों के दिलों को छू जाती थी। 'सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है', 'मोना डार्लिंग' और 'लिली, डोंट बी सिली' जैसे डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर हैं।

अजीत ने करियर में कई यादगार फिल्मों में काम किया और हीरो को कड़ी टक्कर दी। खास बात यह थी कि विलेन होने के बावजूद उनकी फैन फॉलोइंग किसी हीरो से कम नहीं थी। पर्दे पर डर पैदा करने वाले अजीत असल जिंदगी में बेहद शांत और अनुशासित थे।

लंबे फिल्मी करियर के दौरान अजीत को उनके योगदान के लिए सम्मान भी मिला। उन्होंने हिंदी सिनेमा में विलेन की परिभाषा बदल दी और आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों के लिए एक मिसाल बन गए। 22 अक्टूबर 1998 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका रौबदार अंदाज और संघर्ष से भरी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।
 

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