ओडिशा के बंधा कला हैंडलूम कलाकार शरत कुमार पात्रा को पद्मश्री पुरस्कार, बोले- मेरे लिए गर्व की बात

बंधा कला हैंडलूम कलाकार शरत कुमार पात्रा को पद्मश्री पुरस्कार, बोले- मेरे लिए गर्व की बात


ओडिशा, 26 जनवरी। देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार के लिए इस वर्ष ओडिशा के चार व्यक्तित्वों का चयन किया गया है, जिनमें प्रसिद्ध बंधा कला हैंडलूम कलाकार शरत कुमार पात्रा का नाम भी शामिल है। रविवार शाम को हुई इस घोषणा के बाद से ही शरत कुमार पात्रा को राज्यभर से बधाइयां और शुभकामनाएं मिल रही हैं।

उनके इस सम्मान ने न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान को राष्ट्रीय पहचान दिलाई है, बल्कि ओडिशा की पारंपरिक बंधा कला को भी वैश्विक मंच पर गौरवान्वित किया है।

शरत कुमार पात्रा ने आईएएनएस से बातचीत के दौरान आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह उनके जीवन का अत्यंत गर्वपूर्ण क्षण है। उन्होंने सबसे पहले भगवान जगन्नाथ के चरणों में प्रणाम किया और पद्मश्री पुरस्कार के लिए चयन किए जाने पर केंद्र और ओडिशा सरकार का हृदय से धन्यवाद व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि यह सम्मान बंधा कला परंपरा को समर्पित है और इससे आने वाली पीढ़ियों को इस पारंपरिक कला को अपनाने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलेगी।

कटक जिले के मनियाबंधा नुआपटना गांव के निवासी शरत कुमार पात्रा एक जाने-माने बंधा कला कारीगर हैं। उन्होंने अपनी उत्कृष्ट हैंडलूम कारीगरी के जरिए एक विशिष्ट पहचान बनाई है। पारंपरिक तकनीकों और सृजनात्मक दृष्टि के साथ वह साड़ी, कपड़े, धोती और स्कार्फ जैसे विविध हस्तनिर्मित उत्पादों का निर्माण करते हैं। उनके बनाए वस्त्र न केवल स्थानीय बाजारों में, बल्कि देश-विदेश में भी सराहे जाते हैं, जिससे बंधा कला को नई पहचान मिली है।

एक पारंपरिक हैंडलूम बुनकर परिवार में जन्मे शरत कुमार पात्रा ने बचपन से ही इस कला को आत्मसात किया। वर्षों की साधना, मेहनत और नवाचार के बल पर उन्होंने बंधा कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। कला के क्षेत्र में उनके निरंतर योगदान और समर्पण के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाना पूरे ओडिशा के लिए गर्व का विषय है। इस घोषणा से मनियाबंधा की हैंडलूम परंपरा को भी राष्ट्रीय स्तर पर नई ऊर्जा और पहचान मिली है।

शरत कुमार पात्रा की कृतियों में सबसे अद्वितीय 52 मीटर लंबे कपड़े पर संपूर्ण ‘गीत गोविंद’ है। इस असाधारण कृति को पूरा करने में उन्हें सात वर्ष का समय लगा। खास बात यह रही कि इस पूरी रचना में जड़ों और जड़ी-बूटियों से तैयार किए गए प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया गया। वर्तमान में यह ऐतिहासिक मास्टरपीस नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स में सुरक्षित रखा गया है।
 

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