खुशबू सुंदर का कांग्रेस और तमिलनाडु सरकार पर निशाना, बोलीं, "आर्य-द्रविड़ बहस जनता को भटकाने वाली"

खुशबू सुंदर का कांग्रेस और तमिलनाडु सरकार पर निशाना, बोलीं, "आर्य-द्रविड़ बहस जनता को भटकाने वाली"


चेन्नई, 26 जनवरी। भारतीय जनता पार्टी की तमिलनाडु इकाई की उपाध्यक्ष खुशबू सुंदर ने आर्य और द्रविड़ को लेकर चल रही राजनीतिक बहस पर सवाल उठाते हुए इसे जनता के मुद्दों से भटकाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि यह कोई युद्ध का मैदान नहीं है, बल्कि यह इस बात का मंच है कि जनता के लिए कौन बेहतर काम कर सकता है।

खुशबू सुंदर ने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पर निशाना साधते हुए आईएएनएस से कहा, "हमें यह समझने की जरूरत है कि कोई आर्य और द्रविड़ के बीच फर्क क्यों कर रहा है? क्या वे भारत का हिस्सा नहीं हैं? क्या वे भारत की विरासत का हिस्सा नहीं हैं? मुख्यमंत्री को समझना चाहिए कि यह लड़ाई नहीं है, बल्कि लोगों के लिए काम करने की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री स्टालिन के लिए सब कुछ टकराव जैसा लगता है।"

तमिलनाडु में आर्य-द्रविड़ विवाद एक ऐतिहासिक, भाषाई और सांस्कृतिक विचारधारा की लड़ाई है, जो मुख्य रूप से उत्तर (आर्य/संस्कृत) बनाम दक्षिण (द्रविड़/तमिल) पहचान पर केंद्रित है।

द्रविड़ आंदोलन का मानना है कि 'आर्य' बाहर से आए और 'द्रविड़' (मूल निवासी) पर संस्कृत थोपी, जबकि विरोधी विचारधारा इसे अंग्रेजों द्वारा गढ़ी गई नस्लीय 'फूट डालो और राज करो' नीति मानती है, जो वास्तव में केवल भौगोलिक भिन्नता थी।

उन्होंने कांग्रेस नेता शकील अहमद के उस बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें कहा गया था कि कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है और राहुल गांधी का फैसला अंतिम होता है। खुशबू सुंदर ने कहा कि जब उनके जैसे कई युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, सुष्मिता देव और राहुल गांधी की टीम से जुड़े अन्य नेता पार्टी छोड़कर गए, तभी साफ हो गया था कि पार्टी के भीतर असंतोष गहरा है।

उन्होंने आगे कहा कि जब गुलाम नबी आजाद जैसे वरिष्ठ नेता ने भी कांग्रेस से दूरी बनाई और अब शकील अहमद जैसे नेता इस तरह के आरोप लगा रहे हैं, तो यह दिखाता है कि पार्टी के अंदर लंबे समय से नाराजगी बनी हुई है।

खुशबू सुंदर ने कहा कि राजनीति का मकसद जनता की सेवा होना चाहिए, न कि समाज को बांटने वाले मुद्दों को बढ़ावा देना। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों को आपसी टकराव की जगह विकास, रोजगार, और जनता की भलाई जैसे विषयों पर ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने भरोसा जताया कि देश और राज्य की जनता ऐसे मुद्दों को समझती है और अपने भविष्य के लिए सही विकल्प चुनने में सक्षम है। उनके अनुसार, राजनीति में पारदर्शिता, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन ही मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।
 

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