यादों में कृष्णा सोबती: एक बेबाक आवाज, भाषा और साहस की अमर गाथा

यादों में कृष्णा सोबती: एक बेबाक आवाज, भाषा और साहस की अमर गाथा


नई दिल्ली, 24 जनवरी। 25 जनवरी की तारीख अपने आप में हिंदी साहित्य के लिए खास है। यह तारीख उस महान लेखिका को याद करने का दिन है, जिन्होंने दशकों तक हिंदी को नई ऊर्जा और नई नैतिक चुनौती दी। ये नाम है कृष्णा सोबती का, जिनका इस दुनिया से जाना उस रचनात्मक साहस का जाना था, जो लिखते समय किसी सुविधा, संकोच या किसी तयशुदा चौखटे को स्वीकार नहीं करता।

'बुद्ध का कमंडल लद्दाख' किताब में लेखिका ने हिमालय को देश के भूगोल और इतिहास के महानायक के रूप में वर्णन किया है। लेखिका ने कहा है कि हिमालय देश की चारों दिशाओं में फैले भारतीय जनमानस का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्रोत है। शिखरों पर स्थित हमारे तीर्थों का पवित्र प्रतीक है। हिमालय की ऊंचाइयों में स्थित लद्दाख दूसरे पर्वतीय स्थानों से एकदम अलग है।

किताब में कृष्णा सोबती ने वहां बिताए अपने कुछ दिनों की यादें ताजा की हैं और उन अनुभूतियों को फिर से अंकित किया है जिन्हें विश्व के इसी भू-भाग से अनुभव और अर्जित किया जा सकता है। लद्दाख को कई नामों से जाना जाता है, जिनमें एक नाम ‘बुद्ध का कमंडल’ भी है। बुद्ध के कमंडल, लद्दाख में उदय होती उषाओं, घिरती सांझों और इनके बीच फैले स्तब्धकारी सौन्दर्य के पथरीले विस्तार में टहलती, प्रसिद्ध चित्रकार सिद्दार्थ के कैमरे से लिए गए चित्रों से सजी यह किताब हमें उस जगह ले जाती है जिसका इस धरती पर स्थित होना ही हमें चकित करता है।

कृष्णा सोबती का जन्म 18 फरवरी 1925 को पंजाब प्रांत के गुजरात शहर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनका परिवार ब्रिटिश सरकार में मुलाजिम था और घर का वातावरण लगभग सामन्ती रहा। भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार भारत लौट आया और दो वर्षों तक राजस्थान के सिरोही में महाराजा तेज सिंह के संरक्षण में रहा। यह विस्थापन, यह टूटन और स्मृतियों का बोझ उनकी रचनात्मक चेतना में जीवन भर मौजूद रहा—कभी प्रत्यक्ष तो कभी किसी गहरी सांस्कृतिक परत की तरह। उनकी शिक्षा शिमला, लाहौर और दिल्ली में हुई।

विभाजन के बाद वे दिल्ली में आकर बस गईं और अंत तक दिल्ली ही उनका कर्मक्षेत्र और निवास रहा। 23 साल की उम्र से ही वे लेखन में सक्रिय हो गई थीं। उनकी पहली कहानी 'सिक्का बदल गया है' जुलाई 1948 में अज्ञेय द्वारा संपादित पत्रिका 'प्रतीक' में प्रकाशित हुई और यहीं से स्पष्ट हो गया था कि हिंदी कथा को एक ऐसी आवाज मिलने वाली है, जो परंपरा से संवाद भी करेगी और उससे टकराने का साहस भी रखेगी।

उनके उपन्यास 'जिंदगीनामा', 'दिलो-दानिश' और 'समय सरगम' हिन्दी साहित्य की वे कृतियां हैं, जिन्होंने केवल पाठक नहीं बनाए, बल्कि आलोचनात्मक विमर्श, सामाजिक बहस और नैतिक प्रश्नों की जमीन भी तैयार की। 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जाने वाला 'जिंदगीनामा' ब्रिटिश राज के उत्कर्ष काल की सामाजिक-सांस्कृतिक गाथा है, जहां चिनाब और झेलम के बीच बसे देवा जट गांव का जीवन अपनी पूरी भाषिक, सांस्कृतिक और मानवीय सघनता के साथ जीवित हो उठता है। लोकगीत, उत्सव, अनुष्ठान, घर-आंगन, सहन और दहलीज, यह सब कुछ उनकी भाषा के प्रवाह में बहता चला जाता है।

कृष्णा सोबती की रचनाओं का एक विशिष्ट और साहसी पक्ष है। पंजाब के ग्रामीण-कृषक समाज, विशेषकर महिलाओं के जीवन का खुरदुरा, अनगढ़ और ईमानदार चित्रण। कृष्णा सोबती कम लिखने को ही अपना परिचय मानती थीं, लेकिन उनका यह कम लिखना दरअसल में विशिष्ट लिखना था। हर नई कृति के साथ उन्होंने अपनी ही क्षमताओं का अतिक्रमण किया।

साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता, दिल्ली हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान और 2017 का 53वां ज्ञानपीठ पुरस्कार, ये सम्मान उनके लेखन की सामाजिक और साहित्यिक स्वीकृति के प्रमाण हैं, लेकिन कृष्णा सोबती की असली विरासत उनके पुरस्कार नहीं, उनकी भाषा और दृष्टि है।

लंबी बीमारी के बाद 25 जनवरी 2019 को दिल्ली के एक निजी अस्पताल में उनका निधन हुआ। कृष्णा सोबती आज भी 'जिंदगीनामा' की गलियों में, 'मित्रो मरजानी' की निर्भीक हंसी में, 'ऐ लड़की' के प्रश्नाकुल संवादों में और हिंदी की उस भाषा में जीवित हैं, जो जीवन को पूरी सच्चाई के साथ जीती और लिखती है।
 

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