संकट को अवसर में बदल अलीगढ़ की सुजाता ने रचा इतिहास, ‘श्री शुभांग’ ब्रांड से देशभर तक पहुंची आत्मनिर्भरता

अलीगढ़ की सुजाता राघव ने खड़ा किया ‘श्री शुभांग’ ब्रांड, डिजिटल प्लेटफॉर्म से देशभर तक पहुंचा कारोबार


लखनऊ, 14 मार्च। कोरोना महामारी के कठिन दौर को अलीगढ़ की सुजाता राघव ने अपने साहस और मेहनत से नए अवसर में बदल दिया। पति की नौकरी छूटने के बाद जब परिवार के सामने आय का संकट खड़ा हुआ, तब उन्होंने हार मानने के बजाय आत्मनिर्भर बनने का फैसला किया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़कर उन्होंने न केवल अपना व्यवसाय शुरू किया, बल्कि कई महिलाओं को भी रोजगार से जोड़कर एक नई मिसाल कायम की।

अलीगढ़ जिले के हरदुआगंज क्षेत्र के बड़ा गांव उखलाना की रहने वाली सुजाता राघव को कोरोना काल के दौरान एनआरएलएम योजना के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने गांव की महिलाओं के साथ मिलकर स्वयं सहायता समूह का गठन किया। योजना के तहत मिली आर्थिक सहायता से उन्होंने पूजा सामग्री के निर्माण का काम शुरू किया। वर्ष 2022 में सुजाता ने अन्य महिलाओं के साथ मिलकर 'श्री राघव ग्रामीण महिला आजीविका स्वयं सहायता समूह' बनाया।

शुरुआत मिट्टी के दीयों के लिए सूती बातियां बनाने से हुई। धीरे-धीरे उत्पादों की मांग बढ़ने लगी और समूह ने धूपबत्ती, छह प्रकार की धूप स्टिक, आठ प्रकार की धूप कोन, हवन सामग्री, सत्यनारायण पूजा किट और जन्माष्टमी पूजा किट जैसे कई उत्पाद तैयार करने शुरू कर दिए। अपने उत्पादों को अलग पहचान देने के लिए सुजाता ने 'श्री शुभांग' नाम से ब्रांड तैयार किया और उसका ट्रेडमार्क भी पंजीकृत कराया।

उन्होंने अपने उत्पादों को अमेजन, फ्लिपकार्ट और जियो मार्ट जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी सूचीबद्ध किया। इससे उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ी और सालाना कारोबार लगभग दो से ढाई लाख रुपए तक पहुंच गया। आज उनके उत्पाद केवल अलीगढ़ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंच रहे हैं। मंदिरों, बड़े किराना स्टोर और सरकारी कैंटीनों में भी इनकी आपूर्ति की जा रही है। सुजाता की सफलता में डिजिटल प्लेटफॉर्म की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उन्होंने अपने उत्पादों को ओएनडीसी (ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स) से जोड़ दिया, जिससे उनका कारोबार जिला स्तर से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया। अब देश के किसी भी हिस्से से ग्राहक ऑनलाइन उनके उत्पाद मंगा सकते हैं। शुरुआत में डिजिटल तकनीक सीखना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था, लेकिन ओएनडीसी टीम, एनआरएलएम और परिवार के सहयोग से उन्होंने इसे आसानी से सीख लिया। आज मोबाइल के माध्यम से ऑर्डर प्राप्त करना, इन्वेंटरी प्रबंधन और ऑनलाइन कैटलॉग के जरिए उत्पादों की बिक्री करना उनके लिए सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।

सुजाता राघव की पहल से आज कई महिलाओं के जीवन में बदलाव आया है। उनके समूह से 10 महिलाओं को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला है, जबकि करीब 10 अन्य महिलाएं पैकिंग और आपूर्ति जैसे कार्यों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं। समूह से जुड़ी महिलाएं औसतन 7 से 8 हजार रुपये प्रतिमाह कमा रही हैं और समूह की कुल मासिक आय सवा लाख से डेढ़ लाख रुपए तक पहुंच चुकी है।

सुजाता का कहना है कि जब महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बनती हैं, तो पूरा परिवार और समाज मजबूत होता है। उनकी यह सफलता कहानी बताती है कि दृढ़ संकल्प, सामूहिक प्रयास और सही मार्गदर्शन के साथ सीमित संसाधनों में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।
 

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