चुनाव से ठीक पहले सबरीमाला पर केरल में नया बवाल, माकपा-कांग्रेस राजनीतिक फायदे के लिए भिड़े

सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा फिर गरमाया, चुनाव से पहले माकपा और कांग्रेस आमने-सामने


तिरुवनंतपुरम, 14 मार्च। केरल में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। विधानसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार के रुख में बदलाव को लेकर सत्तारूढ़ सीपीआई(एम) और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर राजनीतिक फायदे के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल करने का आरोप लगा रहे हैं।

केरल में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने महिलाओं के प्रवेश को लेकर अपना रुख सिर्फ चुनाव को ध्यान में रखकर बदला है। शनिवार को एर्नाकुलम में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार अब उसी स्थिति में आ गई है, जो पहले विपक्ष की थी।

सतीशन ने कहा, "सरकार अब वही रुख अपना रही है, जो पहले सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर विपक्ष ने लिया था। इसके बावजूद वे लगातार विपक्ष पर आरोप लगाते हैं कि हमने ही विवाद पैदा किया और अदालत में मामला हार गए।"

उन्होंने कहा कि पहले सरकार खुद को प्रगतिशील मूल्यों का समर्थक बताती थी और 'वुमेन्स वॉल' अभियान जैसे कार्यक्रमों का उदाहरण देती थी। उस समय विपक्ष को पिछड़ी सोच वाला बताया जाता था।

सतीशन ने आरोप लगाया कि अब जब चुनाव करीब आ रहे हैं तो मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और उनके सहयोगी अपने पुराने रुख से पीछे हट रहे हैं। इस दौरान उन्होंने सबरीमाला स्वर्ण चोरी मामले की जांच को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि इस मामले की जांच में अब तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है।

उन्होंने कहा, "अधिकांश आरोपी जमानत पर बाहर हैं और विशेष जांच दल (एसआईटी) अभी तक प्रारंभिक चार्जशीट भी दाखिल नहीं कर पाया है।"

सतीशन ने आशंका जताई कि यह मामला बिना किसी ठोस नतीजे के ही बंद हो सकता है, जिससे लोगों में चिंता बढ़ रही है।

वहीं, सीपीआई(एम) के महासचिव एमए बेबी ने सरकार के बदले हुए रुख का बचाव किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने यह फैसला समाज की मौजूदा भावनाओं और माहौल को ध्यान में रखते हुए लिया है।

उन्होंने बताया कि पहले वाम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को लागू करने की कोशिश की थी, जिसमें सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गई थी। शुरुआत में इस फैसले को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिला था, लेकिन बाद में कुछ लोगों ने अपना रुख बदल लिया।

उन्होंने कहा कि अब सुप्रीम कोर्ट ने खुद अपने पुराने फैसले की समीक्षा करने का निर्णय लिया है और सरकार का वर्तमान रुख समाज की भावना को दर्शाता है।

उन्होंने कहा, "पार्टी की अपनी राय हो सकती है लेकिन यह जरूरी नहीं कि सरकार उसे बिल्कुल उसी तरह लागू करे। फैसले हमेशा समाज की व्यापक स्थिति को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।"

एमए बेबी ने यह भी सुझाव दिया कि मंदिर परंपराओं से जुड़े फैसलों में धार्मिक परंपराओं को जानने वाले विद्वानों और सामाजिक सुधारकों की भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर से जुड़े विशेषज्ञ समिति के मॉडल का उदाहरण भी दिया।
 

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