आरबीआई ने मेट्रो कॉर्प इंफ्रास्ट्रक्चर पर फेमा उल्लंघन के मामले में जारी किया कंपाउंडिंग ऑर्डर

आरबीआई ने मेट्रोकॉर्प इंफ्रास्ट्रक्चर पर फेमा उल्लंघन के मामले में जारी किया कंपाउंडिंग ऑर्डर


नई दिल्ली, 12 मार्च। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मेट्रो कॉर्प इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के खिलाफ फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा), 1999 के उल्लंघन के मामले में कंपाउंडिंग ऑर्डर जारी किया है। यह ऑर्डर 10 फरवरी 2026 को जारी हुआ, जिसके बाद कंपनी के खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई समाप्त हो गई।

मामले की शुरुआत तब हुई जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कंपनी पर फेमा के नियम तोड़ने की जांच शुरू की। जांच पूरी होने के बाद ईडी ने एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी के समक्ष शिकायत दर्ज की। एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी ने 10 जनवरी 2023 को कंपनी और उसके तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों/डायरेक्टर्स को शो-कॉज नोटिस जारी किया था। इन उल्लंघनों में मुख्य रूप से विदेशी निवेश से जुड़े नियमों का पालन न करना शामिल था।

विशेष रूप से, कंपनी ने फेमा 20/2000-आरबी के शेड्यूल 1 के पैरा 9(1)(ए) के तहत विदेशी इनवर्ड रेमिटेंस (यानी विदेश से भारत में आए पैसे) की रिपोर्टिंग में देरी की थी। इसमें कुल राशि लगभग 110.62 करोड़ रुपए थी। इसी तरह, पैरा 9(1)(बी) के तहत शेयर जारी करने के बाद फॉर्म एफसीजीपीआर फाइल करने में भी देरी हुई, जो उसी राशि से जुड़ी थी। ये देरी रिपोर्टिंग के नियमों का उल्लंघन मानी गईं।

कंपनी ने इन उल्लंघनों को सेटल करने के लिए फेमा की धारा 15 के तहत आरबीआई के पास कंपाउंडिंग के लिए आवेदन दिया। आरबीआई ने इस पर ईडी से राय मांगी, और ईडी ने 'नो ऑब्जेक्शन' जारी कर दिया। इसके आधार पर आरबीआई ने कंपाउंडिंग ऑर्डर पास किया, जिसमें कंपनी को एकमुश्त 1,03,320 रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया गया। यह राशि कंपाउंडिंग फीस के रूप में ली गई।

इस भुगतान के साथ ही कंपनी के खिलाफ फेमा के इन उल्लंघनों से जुड़ी एडजुडिकेटिंग प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त हो गई है। अब इस मामले में कोई आगे की कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।

यह घटना दिखाती है कि फेमा उल्लंघनों में कंपाउंडिंग का विकल्प कंपनियों को लंबी अदालती प्रक्रिया से बचाता है, बशर्ते वे स्वेच्छा से आवेदन दें और जुर्माना चुकाएं। आरबीआई और ईडी ऐसे मामलों में सहयोग करते हैं ताकि नियमों का पालन सुनिश्चित हो और व्यापार करने में आसानी बनी रहे। मेट्रो कॉर्प इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड अब इस मुद्दे से मुक्त हो गई है।
 

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