विश्लेषण क्या राफेल खरीदकर भारत फंसा? बिना सोर्स कोड के थेल्स रडार और डसॉल्ट का एप्पल आईफोन जैसा खतरनाक 'क्लोज्ड इकोसिस्टम' ट्रैप

क्या राफेल खरीदकर भारत फंसा? बिना सोर्स कोड के थेल्स रडार और डसॉल्ट का एप्पल आईफोन जैसा खतरनाक 'क्लोज्ड इकोसिस्टम' ट्रैप


जब भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा किया था, तो देश को एक सपना दिखाया गया था—एक ऐसा विमान जो न केवल आसमान में अपराजेय होगा, बल्कि जिसमें भारतीय हथियारों को भी "आसानी से इंटीग्रेट" किया जा सकेगा। लेकिन आज उस सुनहरे सपने पर हकीकत की धूल जमने लगी है।

सच्चाई यह है कि भारत सीधे एक "क्लोज्ड इकोसिस्टम" (Closed Ecosystem) में चल कर गया है, जो बिल्कुल आपके एप्पल आईफोन (Apple iPhone) की तरह काम करता है। यह बाहर से देखने में शानदार और प्रीमियम है, लेकिन इसके अंदर क्या चल रहा है, उस पर पूरी तरह से कंपनी का ताला लगा है।

'आसान इंटीग्रेशन' का फ्रांसीसी लॉलीपॉप​

भारतीय नीति निर्माताओं को यह कहकर राजी किया गया था कि राफेल एक "ओपन आर्किटेक्चर" वाला विमान है, जिसमें हम अपनी मिसाइलें लगा सकेंगे। लेकिन यह दावा भारतीय अधिकारियों को दिया गया एक मीठा 'फ्रांसीसी लॉलीपॉप' साबित हुआ है।

हकीकत यह है कि राफेल का हर एक तार, हर एक कोड डसॉल्ट (Dassault) के कंट्रोल में है। आप दुनिया की सबसे बेहतरीन भारतीय मिसाइल बना सकते हैं, लेकिन उसे राफेल पर लगाने के लिए आपको डसॉल्ट की 'मंजूरी' चाहिए। और यह मंजूरी मुफ्त नहीं मिलती—इसके लिए डसॉल्ट के इंजीनियर काम करेंगे, सर्टिफिकेट देंगे और हर कदम पर एक मोटा बिल भारत सरकार को थमाया जाएगा।

अस्त्र और रुद्रम: अपनी ही मिसाइलों के लिए विदेशी मोहताजी​

इस "डिजिटल गुलामी" का असर अब साफ दिखने लगा है।

भारत की स्वदेशी अस्त्र मार्क-1 (Astra Mk1) और रुद्रम-1 (Rudram-I) मिसाइलें तैयार हैं। सुखोई-30MKI और तेजस जैसे विमानों पर ये गर्जना कर रही हैं, लेकिन राफेल के लिए इन्हें "भारत-विशिष्ट अपग्रेड" (India-specific upgrade) का टैग दिया गया है।

यह टैग ही पूरी कहानी बयां करता है। ये मिसाइलें राफेल की मूल क्षमता का हिस्सा नहीं हैं। इन्हें लगाने के लिए डसॉल्ट को राफेल का सॉफ्टवेयर दोबारा लिखना पड़ेगा, इंटरफेस बदलना पड़ेगा और फ्लाइट ट्रायल करने पड़ेंगे। डसॉल्ट ने राफेल के 'मिशन कंप्यूटर' और 'फ्लाइट कंट्रोल लॉज' (Flight Control Laws) की चाबी अपनी जेब में रखी है। नतीजा? भारतीय मिसाइलों में कोई कमी न होने के बावजूद, उनका इंटीग्रेशन डसॉल्ट की शर्तों और टाइमलाइन पर निर्भर है।

थेल्स रडार: असली खेल यहाँ है​

समस्या की जड़ राफेल की नाक में लगा थेल्स (Thales) AESA रडार है।

आधुनिक हवाई युद्ध में, रडार सिर्फ देखने का यंत्र नहीं है—यह विमान का दिमाग है। यह तय करता है कि दुश्मन कहाँ है, उसे कैसे लॉक करना है और कब फायर करना है (Kill Chain)।

भारत ने शुरुआत में ही भारतीय 'उत्तम' रडार या किसी ओपन-सोर्स रडार की जिद्द न करके, फ्रांसीसी रडार को स्वीकार कर एक बड़ी रणनीतिक चूक कर दी। चूंकि रडार के 'सोर्स कोड' (Source Code) पर हमारा कोई अधिकार नहीं है, हम अपनी मर्जी से इसमें कोई बदलाव नहीं कर सकते। यह बिल्कुल वैसा है जैसे आपने एक महंगा फोन खरीदा हो, लेकिन आप उसमें अपनी मर्जी का ऐप इंस्टॉल नहीं कर सकते, आपको सिर्फ 'ऐप स्टोर' से ही खरीदना होगा।

भविष्य का खतरा: MICA NG का जाल​

डसॉल्ट का यह 'क्लोज्ड इकोसिस्टम' सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं है, यह एक बिजनेस मॉडल है।जल्द ही फ्रांस अपनी नई MICA NG मिसाइल बाजार में उतारेगा। जब भारत अपनी अस्त्र मार्क-2 (Astra MkII) को राफेल पर लगाने की कोशिश कर रहा होगा, तब डसॉल्ट एक नया प्रस्ताव लेकर आएगा— "अस्त्र मार्क-2 के इंटीग्रेशन में तो अभी सालों लगेंगे और बहुत पैसा खर्च होगा, क्यों न आप हमारी तैयार MICA NG खरीद लें? यह तुरंत उपलब्ध है।"

यह तर्क फिर से नीति निर्माताओं को लुभाएगा और भारत का स्वदेशी मिसाइल प्रोग्राम फिर हाशिए पर चला जाएगा। इसे ही 'स्ट्रैटेजिक लॉक-इन' (Strategic Lock-in) कहते हैं।

तकनीक हस्तांतरण नहीं, यह 'किरायेदारी' है​

भारत भले ही भविष्य में राफेल को अपनी धरती पर बनाए, लेकिन अगर विमान का 'दिमाग' (सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम) फ्रांसीसी ही रहा, तो हम मालिक नहीं, सिर्फ 'किरायेदार' (Tenant) बनकर रह जाएंगे। हम बॉडी (Airframe) बनाएंगे, लेकिन उसकी आत्मा (Combat Logic) डसॉल्ट की होगी।

यह आत्मनिर्भरता नहीं है। असली ताकत तब आती है जब तेजस और AMCA जैसे विमानों में रडार भी हमारा हो, कंप्यूटर भी हमारा और कोड भी हमारा। तब तक, राफेल एक बेहतरीन हथियार तो है, पर उसकी लगाम किसी और के हाथ में है।
 

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