भारतीय सेना अब युद्ध के मैदान में एक नई और ऐतिहासिक क्रांति की ओर बढ़ रही है। 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा अब सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरहदों पर तैनात हमारी सेना की मारक क्षमता बनकर उभर रहा है।
थल सेना प्रमुख (COAS) जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एक ऐसा ऐलान किया है जिसने दुश्मनों की नींद उड़ा दी है—भारतीय सेना अब अपनी हर कमान (Command) में हजारों की तादाद में अपने खुद के 'मेड-इन-इंडिया' ड्रोन बना रही है।
हर कमान अब एक 'ड्रोन पावरहाउस'
जनरल द्विवेदी ने साफ कर दिया है कि सेना ने विदेशी हथियारों का मुंह ताकने के बजाय 'इन-हाउस प्रोडक्शन' यानी घर में ही हथियार बनाने का फैसला लिया है। यह दुनिया के किसी भी देश की सेना द्वारा किया गया सबसे बड़ा 'डिसेंट्रलाइज्ड' (विकेंद्रीकृत) प्रयास है।इसका मतलब यह है कि सेना की हर कमान ने या तो 5,000 ड्रोन बना लिए हैं या बनाने की प्रक्रिया में है। सोचिए, जब हर कमान के पास अपने खुद के 5,000 से ज्यादा ड्रोन होंगे, तो दुश्मन की रडार स्क्रीन पर क्या मंजर होगा!
खिलौने नहीं, ये हैं 'साइलेंट किलर'
अक्सर जब हम ड्रोन की बात करते हैं तो शादी-ब्याह वाले फोटोग्राफी ड्रोन दिमाग में आते हैं, लेकिन जनरल द्विवेदी ने स्पष्ट किया है कि ये वो नहीं हैं। ये लॉन्ग-रेंज कॉम्बैट ड्रोन हैं।- रेंज: सेना ने इनका परीक्षण 100 किलोमीटर तक की गहराई में मार करने के लिए कर लिया है और इसे और आगे बढ़ाया जा रहा है।
- मकसद: ये ड्रोन दुश्मन के इलाके में गहराई तक घुसकर निगरानी (Deep Surveillance) तो करेंगे ही, साथ ही सटीक हमला (Precision Strike) करने में भी सक्षम होंगे।
- लॉन्टरिंग म्यूनिशंस: आसान भाषा में कहें तो ये 'आत्मघाती ड्रोन' की तरह भी काम करेंगे जो हवा में मंडराते रहेंगे और मौका मिलते ही दुश्मन के टैंक या बंकर पर गिरकर उसे तबाह कर देंगे।
इलाके के हिसाब से खास तैयारी (कस्टमाइजेशन)
इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे खास बात इसकी 'अडाप्टेबिलिटी' है। भारत की भौगोलिक स्थिति बहुत विविध है, इसलिए 'वन साइज फिट्स ऑल' वाला फार्मूला यहाँ नहीं चलता।सेना ने हर कमान को अपनी ज़रूरत के हिसाब से ड्रोन बनाने की छूट दी है:
- पहाड़ी कमान (चीन सीमा): यहाँ ऐसे ड्रोन बनाए जा रहे हैं जो लद्दाख जैसे इलाकों में पतली हवा (Thin air) और कड़ाके की ठंड में भी भारी पेलोड के साथ उड़ सकें।
- रेगिस्तानी कमान (पाकिस्तान सीमा): यहाँ जोर 'लॉन्ग रेंज' और खुले मैदान में छिपे दुश्मन को खोजने पर है।
- पूर्वी और उत्तर-पूर्वी कमान (जंगल): यहाँ ऐसे 'साइलेंट ड्रोन' तैयार हो रहे हैं जो घने जंगलों में बिना आवाज़ किए दुश्मन की टोह ले सकें।
अतिरिक्त जानकारी (Extra Intel)
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन और आर्मेनिया-अज़रबैजान युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य के युद्ध तोपों से ज्यादा ड्रोन्स से लड़े जाएंगे।भारतीय सेना ने 2024 को 'तकनीक अवशोषण वर्ष' (Year of Technology Absorption) घोषित किया था, और यह कदम उसी दिशा में एक बड़ी छलांग है।
जब सेना खुद ड्रोन बनाती है, तो युद्ध के दौरान अगर 100 ड्रोन नष्ट भी हो जाएं, तो सेना को नई खेप के लिए किसी कंपनी के टेंडर का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा, वे तुरंत और ड्रोन तैयार कर लेंगे।
दुश्मन के एयर-डिफेंस को चकमा देने की रणनीति
सेना की योजना 'सैचुरेशन अटैक' (Saturation Attack) की है। यानी एक साथ इतने सारे ड्रोन, डिकॉय (नकली) ड्रोन और स्ट्राइक ड्रोन छोड़ना कि दुश्मन का महंगा एयर डिफेंस सिस्टम (जैसे S-400 या आयरन डोम) कंफ्यूज हो जाए कि किसे मारें और किसे छोड़ें।यह कदम भारत को एक 'ड्रोन बायर' (खरीदार) से 'ड्रोन प्रोड्यूसर' (निर्माता) में बदल रहा है। अब हमारी सेना दुश्मन को सरप्राइज देने के लिए पूरी तरह तैयार है।