भारतीय समंदर की सुरक्षा अब और भी अभेद्य होने जा रही है। वो दिन दूर नहीं जब हिंद महासागर (Indian Ocean) में दुश्मन की पनडुब्बियां सिर उठाने से पहले सौ बार सोचेंगी।
भारत की निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी Tata Advanced Systems Limited (TASL), यूरोपीय कंपनी Airbus और हमारे अपने DRDO ने मिलकर एक ऐसा बीड़ा उठाया है, जो भारतीय नौसेना और कोस्ट गार्ड की ताकत को कई गुना बढ़ा देगा।
ये तीनों दिग्गज मिलकर C-295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का एक बेहद खास और घातक वेरिएंट तैयार करने जा रहे हैं। इसे तकनीकी भाषा में MRMR (Medium Range Maritime Reconnaissance) कहा जाता है, लेकिन आसान भाषा में समझें तो यह समंदर में भारत की "तीसरी आंख" बनने वाला है।
1. क्यों खास है यह 'देसी' गठबंधन?
अक्सर हम विदेशी हथियारों पर निर्भर रहते थे, लेकिन इस प्रोजेक्ट की जान इसकी "स्वदेशी तकनीक" है। सूत्रों के मुताबिक, भले ही विमान का ढांचा (Airframe) एयरबस का होगा, लेकिन इसके अंदर की 'आत्मा' यानी इसके सेंसर्स और रडार पूरी तरह से भारतीय होंगे।DRDO की प्रयोगशाला CABS (Centre for Airborne Systems) ने इसके लिए एक अत्याधुनिक सेंसर सूट तैयार किया है। इसमें शामिल होंगे:
- AESA रडार: यह दुश्मन के जहाजों और पेरिस्कोप को मीलों दूर से पकड़ लेगा।
- EO/IR पेलोड: यानी इलेक्ट्रो-ऑप्टिक और इन्फ्रारेड कैमरे, जो घने अंधेरे या खराब मौसम में भी दुश्मन को देख सकेंगे।
2. नौसेना के लिए 'शिकारी' और कोस्ट गार्ड के लिए 'पहरेदार'
यह विमान दो अलग-अलग भूमिकाओं में तैयार किया जा रहा है:- Indian Navy के लिए (MRMR): नौसेना वाला वर्जन एक असली 'शिकारी' होगा। इसका मुख्य काम होगा Anti-Submarine Warfare (ASW) यानी दुश्मन की पनडुब्बियों को ढूंढना और उन्हें ठिकाने लगाने में मदद करना। इसके अलावा, यह जासूसी (Electronic Intelligence) का काम भी बखूबी करेगा।
- Indian Coast Guard के लिए (MMMA): कोस्ट गार्ड के लिए बन रहा वेरिएंट (Multi-Mission Maritime Aircraft) एक 'रक्षक' की भूमिका निभाएगा। इसमें भारी-भरकम मिलिट्री सेंसर्स की जगह प्रदूषण पर नजर रखने वाले उपकरण और सर्च-एंड-रेस्क्यू (बचाव कार्य) की तकनीक लगी होगी।
3. स्पेन से वड़ोदरा तक का सफर
यह प्रोजेक्ट 'Make in India' का एक बेहतरीन उदाहरण है। शुरुआत में विमानों में बदलाव स्पेन में किए जाएंगे, जहाँ एयरबस के पास इसका लंबा अनुभव है। लेकिन असली खेल तब शुरू होगा जब यह तकनीक भारत आएगी।बाकी के विमानों का निर्माण और इंटीग्रेशन गुजरात के वड़ोदरा में स्थित TASL की फैसिलिटी में किया जाएगा। इसका मतलब है कि भविष्य में इन विमानों की मरम्मत और देखरेख के लिए हमें किसी दूसरे देश का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा।
4. P-8I और डोर्नियर के बीच की कड़ी
अब आप सोच रहे होंगे कि हमारे पास पहले से ही अमेरिका से लिए गए P-8I Poseidon जैसे खतरनाक विमान हैं, तो इसकी क्या जरूरत?दरअसल, P-8I एक बहुत बड़ा और महंगा विमान है जो लंबी दूरी के लिए है, जबकि Dornier-228 छोटी दूरी के लिए है। इन दोनों के बीच में एक गैप था, जिसे यह C-295 का नया अवतार भरेगा। यह विमान कम खर्च में लंबी दूरी तक गश्त लगा सकता है और इसमें डेटा फ्यूजन की ऐसी तकनीक है जो ऑपरेटर को एक ही स्क्रीन पर सारी जानकारी दे देगी।