DRDO की बड़ी कामयाबी: 12 मिनट के स्क्रैमजेट टेस्ट ने कैसे बदली भारत की तस्वीर? अब प्रयोग नहीं, सीधे हथियार बनाने की तैयारी

DRDO की बड़ी कामयाबी: 12 मिनट के स्क्रैमजेट टेस्ट ने कैसे बदली भारत की तस्वीर? अब प्रयोग नहीं, सीधे हथियार बनाने की तैयारी


भारतीय रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में 9 जनवरी, 2026 का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने एक ऐसी तकनीक में महारत हासिल कर ली है, जो भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करती है जिनके पास 'हाइपरसोनिक' ताकत है।

हैदराबाद स्थित DRDL (डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेटरी) में वैज्ञानिकों ने एक 'स्क्रैमजेट इंजन' को जमीन पर पूरे 12 मिनट तक सफलतापूर्वक चलाकर (टेस्ट कर) यह साबित कर दिया है कि भारत अब सिर्फ प्रयोग नहीं कर रहा, बल्कि खतरनाक हाइपरसोनिक मिसाइल बनाने के लिए तैयार है।

यह खबर इतनी बड़ी क्यों है?​

अक्सर हम सुनते हैं कि DRDO ने कोई मिसाइल टेस्ट की जो कुछ सेकंड या मिनट उड़ी। लेकिन 12 मिनट तक इंजन का लगातार चलना कोई मामूली बात नहीं है।

हाइपरसोनिक स्पीड (आवाज की गति से 6 गुना तेज) पर इंजन को चालू रखना और उसे स्थिर रखना, तूफ़ान में दिया जलाने जैसा मुश्किल है। इस टेस्ट ने यह साबित कर दिया है कि भारत ने वह तकनीक विकसित कर ली है जो इंजन को इतनी भयानक गर्मी और स्पीड में भी 'जिंदा' रख सकती है।

यह अब केवल एक 'साइंस प्रोजेक्ट' नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा इंजन बन चुका है जिसे मिसाइल में फिट किया जा सकता है।

3 बड़ी बातें जो इस टेस्ट ने साबित कीं:​

  1. प्रयोगशाला से बाहर निकला भारत: पहले के टेस्ट केवल यह दिखाने के लिए थे कि तकनीक काम करती है या नहीं। लेकिन 12 मिनट का यह टेस्ट (Long-duration burn) बताता है कि इंजन लंबी दूरी तक मिसाइल को ले जाने में सक्षम है।
  2. हथियार बनने के लिए तैयार: किसी भी मिसाइल को हवा में उड़ाने से पहले जमीन पर उसे उतनी ही देर चलाकर देखा जाता है। 12 मिनट का यह सफल ग्राउंड टेस्ट एक 'फाइनल चेकपॉइंट' है। इसका मतलब है कि अगला कदम सीधे आसमान में उड़ान भरना होगा।
  3. गर्मी को मात देना (Active Cooling): जब कोई चीज 7000 किमी/घंटा की रफ़्तार से चलती है, तो घर्षण से तापमान 1000 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है। सामान्य इंजन इसमें पिघल जाएगा। लेकिन DRDO ने 'एक्टिव कूलिंग' तकनीक में महारत हासिल कर ली है। इसमें ईंधन (Fuel) ही इंजन को ठंडा रखने का काम करता है और फिर जलकर ऊर्जा देता है।

दुश्मन के लिए क्यों है यह खतरे की घंटी? (स्ट्राइक रेंज का गणित)​

इस 12 मिनट के टेस्ट का सीधा असर भारत की मारक क्षमता (Strike Range) पर पड़ेगा। आइए इसे सरल गणित से समझते हैं:
  • स्पीड: यह इंजन मैक 6 से मैक 7 (करीब 7,400 किलोमीटर प्रति घंटा) की रफ़्तार देगा।
  • समय: इंजन 12 मिनट (यानी 0.2 घंटे) तक चला।
  • दूरी: 7,400 किमी/घंटा × 0.2 घंटे = 1,480 किलोमीटर।
अगर इसमें शुरुआती बूस्टर रॉकेट की दूरी (100-150 किमी) जोड़ दें, तो यह मिसाइल 1,600 किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन को पलक झपकते ही तबाह कर सकती है।

भारत को क्या फायदा होगा?​

यह तकनीक भारत को अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों के एलीट ग्रुप में शामिल करती है।
  • पकड़ना नामुमकिन: सामान्य बैलिस्टिक मिसाइलें एक तय रास्ते पर चलती हैं, जिसे रडार पकड़ सकता है। लेकिन स्क्रैमजेट वाली हाइपरसोनिक मिसाइलें वातावरण के भीतर, नीचे और बहुत तेज उड़ती हैं। इन्हें रडार पर पकड़ना और हवा में नष्ट करना लगभग असंभव होता है।
  • सटीक हमला: यह भारत को ब्रह्मोस (सुपरसोनिक) और लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलों के बीच का एक बेहतरीन विकल्प देती है। इससे तिब्बत के पठार या हिंद-प्रशांत क्षेत्र में छिपे दुश्मन के ठिकानों पर बिना परमाणु हथियार इस्तेमाल किए, सटीक हमला किया जा सकता है।
DRDO का यह टेस्ट बताता है कि भारत ने हाइपरसोनिक रेस में 'तकनीक सीखने' (Technology Demonstration) का चरण पूरा कर लिया है। अब अगला चरण 'हथियार बनाने' (Weaponisation) और उसे सेना को सौंपने का है।
 

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