पाकिस्तान में सेना का बिजनेस पर कब्जा: वैश्विक कंपनियों के लिए बना 'खतरा', देश छोड़ने को मजबूर हुए बड़े कॉरपोरेट्स

पाकिस्तान में सेना का बिजनेस पर कब्जा: वैश्विक कंपनियों के लिए बना 'खतरा', देश छोड़ने को मजबूर हुए बड़े कॉरपोरेट्स


पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और वहां के बिजनेस माहौल को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है।

'एशियन न्यूज पोस्ट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां अब पाकिस्तान से अपना बोरिया-बिस्तर समेट रही हैं।

इसका सबसे बड़ा कारण सिर्फ आर्थिक मंदी नहीं, बल्कि व्यापार में वहां की सेना का बढ़ता दखल और 'अनफ्रेंडली' (प्रतिकूल) माहौल बताया जा रहा है।

सरल भाषा में समझिए कि आखिर पाकिस्तान में ऐसा क्या हो रहा है कि माइक्रोसॉफ्ट और शेल जैसी दिग्गज कंपनियां वहां से भाग रही हैं।

क्यों भाग रही हैं बड़ी कंपनियां?​

रिपोर्ट्स बताती हैं कि पाकिस्तान अब विदेशी निवेश के लिए एक "हाई-रिस्क जोन" (खतरे वाला क्षेत्र) बन गया है।

पिछले कुछ सालों में कई मल्टीनेशनल कंपनियों ने या तो अपना कामकाज बंद कर दिया है या अपनी हिस्सेदारी बेच दी है।
  • कौन-कौन सी कंपनियां गईं?: इस लिस्ट में कई बड़े नाम शामिल हैं। रोजमर्रा की चीजें बनाने वाली कंपनी Procter & Gamble (P&G), एनर्जी सेक्टर की दिग्गज Shell (जिसने अपना कारोबार सऊदी अरब की वफी एनर्जी को बेच दिया) और TotalEnergies जैसी कंपनियों ने वहां से निकलने का फैसला किया है।
  • टेक और दवा कंपनियां सबसे ज्यादा परेशान: माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft), फाइजर (Pfizer), यामाहा (Yamaha), उबर (Uber), करीम (Careem), सीमेंस (Siemens) और बायर (Bayer) जैसी कंपनियों ने भी वहां काम करना मुश्किल बताया है। पिछले तीन सालों में 21 से ज्यादा दवा और टेक कंपनियां पाकिस्तान छोड़ चुकी हैं।

'मिल्बस' (Milbus): सेना का अपना ही एक अलग कारोबार​

इस पलायन की एक मुख्य वजह 'मिल्बस' यानी मिलिट्री बिजनेस बताई जा रही है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान की सेना एक समानांतर अर्थव्यवस्था चलाती है।
  1. सेना का साम्राज्य: रियल एस्टेट, सीमेंट, खाद और बैंकिंग जैसे बड़े सेक्टरों में सेना से जुड़ी कंपनियों का दबदबा है। फौजी फाउंडेशन जैसी संस्थाएं टैक्स में छूट और सरकारी नियमों में रियायत का फायदा उठाती हैं।
  2. आम व्यापारी को नुकसान: चूंकि सेना की कंपनियों को विशेष छूट मिलती है, इसलिए सामान्य प्राइवेट कंपनियों के लिए उनसे मुकाबला करना नामुमकिन हो जाता है। इसे "अनफेयर प्लेइंग फील्ड" कहा जाता है, जहां नियम सबके लिए एक जैसे नहीं हैं।
  3. SIFC की भूमिका: वहां बनाई गई 'स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल' (SIFC) का नेतृत्व भी सेना के पास है, जो कथित तौर पर सेना से जुड़े प्रोजेक्ट्स को ही प्राथमिकता देती है।

आर्थिक बर्बादी और सुरक्षा का डर​

कंपनियों के भागने के पीछे सिर्फ सेना का दखल ही नहीं, बल्कि चरमराती अर्थव्यवस्था भी जिम्मेदार है:
  • महंगाई और गिरता रुपया: पाकिस्तान की करेंसी की कीमत लगातार गिर रही है, जिससे विदेशी कंपनियों का मुनाफा घट रहा है।
  • बिजली और सुरक्षा: आए दिन बिजली गुल रहना और देश में बढ़ती आतंकी घटनाएं कंपनियों के लिए काम करना मुश्किल बना रही हैं।
  • लाल फीताशाही: रिपोर्ट में कहा गया है कि वहां नियम इतने बार बदलते हैं और अफसरों की मनमानी इतनी ज्यादा है कि कोई भी कंपनी लंबे समय की प्लानिंग नहीं कर पाती। घूसखोरी और सिफारिश के बिना काम होना मुश्किल है।

इसका नतीजा क्या होगा?​

इसका सीधा असर पाकिस्तान की जनता पर पड़ रहा है। विदेशी निवेश (FDI) पिछले 10 सालों के सबसे निचले स्तर (1.2 अरब डॉलर) पर आ गया है। जब कंपनियां जाती हैं, तो अपने साथ नौकरियां और नई टेक्नोलॉजी भी ले जाती हैं।

विदेशी निवेशक अब पाकिस्तान की जगह दुबई (UAE) या सिंगापुर जैसे स्थिर देशों में पैसा लगाना पसंद कर रहे हैं। वहीं, पाकिस्तान के बजट का एक बड़ा हिस्सा आम लोगों की सुविधाओं के बजाय 'Defence' (रक्षा) खर्च और सेना के प्रोजेक्ट्स में जा रहा है, जिससे गरीबी और महंगाई और बढ़ रही है।
 
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