यूरी गागरिन ने लगाई थी ऐतिहासिक 'छलांग': कैप्सूल छोड़ अंतरिक्ष में रचा इतिहास, ऐसे हुई थी सुरक्षित वापसी

स्पेस में जाने वाले पहले एस्ट्रोनॉट यूरी गागरिन, जब कैप्सूल छोड़ स्पेसक्राफ्ट से लगाई थी 'छलांग'


नई दिल्ली, 9 मार्च। 12 अप्रैल 1961 का वह ऐतिहासिक दिन जब सोवियत संघ के कॉस्मोनॉट यूरी गागरिन स्पेस में जाने वाले पहले इंसान बने। उनकी उड़ान ने मानव इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। "पोयेखाली!!" (चलो चलें) कहते हुए उन्होंने कजाकिस्तान के बैकोनूर कॉस्मोड्रोम से वोस्तोक 1 स्पेसक्राफ्ट में सवार होकर उड़ान भरी थी।

क्या अंतरिक्ष में इंसान जीवित रह सकता है? स्पेसक्राफ्ट से यात्रा संभव है? क्या पृथ्वी से संपर्क मजबूत और प्रभावी रहेगा? क्या सुरक्षित वापसी हो पाएगी? इन सवालों के जवाब लेने के लिए अंतरिक्ष जाने वाले पहले इंसान यूरी गागरिन की आज जयंती है। उन्होंने 12 अप्रैल 1961 को ये सब संभव साबित किया।

यह मिशन पृथ्वी की एक पूरी परिक्रमा पूरी करने वाला पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान था। वोस्तोक 1 ने 27,400 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी का चक्कर लगाया। पूरी उड़ान लगभग 108 मिनट चली। वापसी के दौरान स्पेसक्राफ्ट को कंप्यूटर से नियंत्रित किया गया था। लेकिन सबसे खास बात यह थी कि गागरिन कैप्सूल के अंदर उतरे नहीं। सोवियत इंजीनियरों ने कैप्सूल की लैंडिंग के लिए पर्याप्त ब्रेकिंग सिस्टम विकसित नहीं की थी। लिहाजा, कैप्सूल तेज गति से उतरने पर इंसान के लिए खतरनाक हो सकता था। इसलिए योजना के अनुसार, गागरिन ने स्पेसक्राफ्ट से बाहर निकलकर पैराशूट से उतरना था।

जब वोस्तोक 1 पृथ्वी की सतह से लगभग 23 हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचा, तब स्पेसक्राफ्ट का हैच खुला और दो सेकंड बाद गागरिन को इजेक्शन सीट से बाहर छलांग लगा दिए। उन्होंने अपनी अलग पैराशूट से उतरना शुरू किया। उनका पैराशूट तुरंत खुल गया और करीब 10 मिनट की पैराशूट डिसेंट के बाद वह सुरक्षित जमीन पर उतर सके।

इस खास तरीके की वजह से सोवियत अधिकारियों ने शुरू में यह बात छिपाई रखी। अंतरराष्ट्रीय एविएशन फेडरेशन (एफएआई) के नियमों के अनुसार, विश्व रिकॉर्ड के लिए पायलट को क्राफ्ट के साथ ही लैंड करना जरूरी था। इसलिए शुरुआती रिपोर्ट्स में कहा गया कि गागरिन कैप्सूल के साथ उतरे। लेकिन बाद में यह खुलासा हुआ कि वह पैराशूट से उतरे थे। यह फैसला सुरक्षा के लिए लिया गया था, क्योंकि कैप्सूल की लैंडिंग बहुत तेज और उछाल वाली थी।

इस सफल उड़ान ने उन्हें सोवियत संघ का नेशनल हीरो बना दिया। वह अंतरराष्ट्रीय सेलिब्रिटी बन गए। बाद में वह कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर के डिप्टी डायरेक्टर भी बने और नए कॉस्मोनॉट्स को ट्रेनिंग दी। उन्होंने एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में थीसिस भी पूरी की। हालांकि, सोवियत अधिकारी उन्हें दोबारा स्पेस में भेजने से हिचकिचाते रहे, क्योंकि उन्हें खोने का डर था। दुर्भाग्य से 27 मार्च 1968 को 34 साल की उम्र में गागरिन एक एमआईजी-15यूटीआई जेट ट्रेनिंग फ्लाइट के दौरान क्रैश में मारे गए। उनकी मौत ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया।

आज भी गागरिन की विरासत जीवित है। कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर का नाम गागरिन कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर रखा गया। बैकोनूर का लॉन्च पैड 'गागरिन स्टार्ट' कहलाता है, जहां से आज भी आईएसएस मिशन लॉन्च होते हैं। ह्यूस्टन में उनकी और अमेरिकी एस्ट्रोनॉट जॉन ग्लेन की प्रतिमाएं साथ में स्थित है।
 

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