मौन शक्ति से 'निर्णायक नारायणी' तक: भारती-नारी की उड़ान! महिला चिंतकों का अखिल भारतीय सम्मेलन गढ़ेगा नई पहचान

भारती-नारी से नारायणी: मौन शक्ति से निर्णायक शक्ति तक, महिला चिंतको का अखिल भारतीय सम्मेलन


नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस) अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पश्चिमी देशों से आई एक अवधारणा है। नारी मुक्ति का जो आंदोलन पश्चिमी देशों में शुरू हुआ, उसने बहुत जोर पकड़ा, और इसकी धमक भारत तक भी आई।

यह एक ऐसा आंदोलन था जो समान मजदूरी और समानता के अधिकार की मांग को लेकर शुरू हुआ था, लेकिन पता नहीं कैसे यह पूरी तरह से पुरुष विरोधी बन गया। पुरुषों से हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा, उनको अपना शोषक मानना, पितृसत्ता का विरोध, विवाह संस्था का विरोध, त्योहारों, और रस्मों-रिवाजों का विरोध, और यहां तक कि महिलाओं ने कई तरह से विरोध-प्रदर्शन भी किए। एक समय तक तो खूब प्रसिद्धि मिली, अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं, और यह महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने में काफी हद तक सफल रहा, लेकिन इसके कुछ साइड इफेक्ट्स भी हुए।

पश्चिमी देशों में एक समय के बाद इसका जोश और रंग फीका पड़ने लगा। भारत जैसे परंपरागत समाज में भी नारीमुक्ति की पश्चिमी अवधारणा बहुत सफल नहीं हो पाई। भारतीय चिंतन परंपरा में नारी को केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि सृष्टि-चेतना की आधारशिला माना गया है। “नारी से नारायणी” की अवधारणा उसी आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है, जहां स्त्री धैर्य, संयम, मौन, और सहनशीलता से आगे बढ़कर रणनीतिक, सृजनात्मक, और दिव्य शक्ति का स्वरूप धारण करती है। यह परिवर्तन केवल अधिकारों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मबोध और शक्ति-साक्षात्कार की प्रक्रिया है।

पश्चिमी नारी मुक्ति आंदोलन की सोच से बिल्कुल अलग है भारतीय महिला सशक्तिकरण की अवधारणा। पहली बात तो वैदिक काल से ही भारतीय महिला सशक्त है, विदुषी है, महिषी है, आचार्य है, और गुरु है। पश्चिमी देशों की महिलाओं ने संघर्ष करके जो अधिकार प्राप्त किए, वो उसे हजारों वर्ष पहले प्राप्त थे। भारतीय सोच नारी मुक्ति की नहीं, नारी सशक्तिकरण की है; पुरुषों से प्रतिद्वंद्विता नहीं, एक दूसरे के पूरक होने की है। भारतीय चिंतन में नारी और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं, और नारी परिवार की धुरी है, समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान देती है।

इसी सोच के साथ दिल्ली के विज्ञान भवन में 7 और 8 मार्च को देश भर की महिला चिंतकों का अखिल भारतीय सम्मेलन होगा, जिसका नाम दिया गया है—'भारती-नारी से नारायणी'। इस संकल्पना को अष्टलक्ष्मी और अष्ट सिद्धि के साथ देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री-सशक्तिकरण कोई आधुनिक आंदोलन मात्र नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना की शाश्वत धारा है।

आज की नारी मौन शक्ति से आगे बढ़कर नीति-निर्माण, विज्ञान, साहित्य, कला और आध्यात्मिकता में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ रही है। नारी जब अपने भीतर स्थित आठ शक्तियों को पहचान लेती है, तब वह केवल परिवार की आधारशिला नहीं रहती; वह समाज और राष्ट्र की दिशा-निर्देशिका बन जाती है। यही है “नारी से नारायणी” की वास्तविक परिभाषा, एक ऐसी यात्रा जिसमें स्त्री अपनी अंतर्निहित दिव्यता को जागृत कर विश्व को आलोकित करती है, जिसमें भारतीय परंपरा और वैदिक काल की आठ शक्तियों को 21वीं वीं सदी के अनुसार परिभाषित किया गया है। जब हम “नारी से नारायणी” की संकल्पना को अष्टलक्ष्मी और अष्ट सिद्धि के साथ देखते हैं, पाते हैं कि नारी ने सदैव परिवारों को संभाला है, परंपराओं को सुरक्षित रखा है और समाज को स्थायित्व प्रदान किया है। किंतु आज महिला सशक्तिकरण की चर्चा केवल अधिकारों तक सीमित नहीं है; महिलाएं समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रनिर्माण की सक्रिय निर्माता बन चुकी हैं। उनमें संतुलन, समन्वय और सकारात्मक परिवर्तन लाने की अद्वितीय क्षमता निहित है। इसी व्यापक दृष्टि को साकार करने के उद्देश्य से “भारती” सम्मेलन महिलाओं को जोड़कर भारत को जोड़ने का प्रयास है। महिला शक्ति के आठ आयाम सम्मेलन में महिला सशक्तिकरण को आठ प्रमुख स्तंभों के माध्यम से परिभाषित किया गया है। इनमें आठ क्षेत्रों की विशेषज्ञ हिस्सा लेंगी।

1. विद्या—ज्ञान ही शक्ति: उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना, कौशल विकास, रोजगार और नेतृत्व के अवसर सुदृढ़ करना। क्योंकि शिक्षित नारी ही जागरूक समाज की आधारशिला है।

2. मुक्ति – सच्ची स्वतंत्रता आत्म-पहचान, मानसिक विकास और सामाजिक चेतना से प्राप्त होती है। गरीबी, हिंसा और असमानता से मुक्ति पाकर सम्मानपूर्ण जीवन ही वास्तविक आज़ादी है।

3. प्रकृति – संवेदनशील व्यवस्था मासिक धर्म, मातृत्व, बाल-देखभाल और रजोनिवृत्ति जैसी अवस्थाओं में सहयोगी वातावरण का निर्माण। ऐसी कार्य-संरचना, जिससे महिलाएं परिवार और कार्यस्थल दोनों का संतुलन सहजता से कर सकें।

4. सिद्धि – सफलता की कहानियां उन महिलाओं का सम्मान करती हैं जिन्होंने अपनी मेहनत और धैर्य से परिवार और समाज को सशक्त बनाया। उनकी उपलब्धियां नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

5. शक्ति—आत्मनिर्भरता: आर्थिक साक्षरता, कौशल प्रशिक्षण और ऋण सुविधाओं के माध्यम से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना। नैतिक मूल्यों के साथ उन्नति पर बल देना।

6. चेतना – कार्यस्थल पर समानता, भेदभाव, और असमानता को समाप्त कर ऐसा वातावरण बनाना जहां योग्यता के आधार पर महिलाओं को निर्णय लेने और नेतृत्व करने का अवसर मिले।

7. संस्कृति – मजबूत जड़ें परिवार और समाज के संस्कारों को सुदृढ़ करने में महिलाओं की महत्वपूर्णभूमिका। आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक चेतना को सुरक्षित रखना।

8. कृति – कार्य योजना विचारों को ठोस योजनाओं में परिवर्तित करना। सम्मेलन को सकारात्मक परिवर्तन की स्थायी शुरुआत बनाना।

“भारती नारी सेनारायणी” तीन संस्थाएं मिल कर आयोजित कर रही है: भारतीय विद्वत परिषद, जो एक ट्रस्ट है, जो भारतीय शास्त्रों के अध्ययन और शोध को प्रोत्साहित करता है। यह 2,500 से अधिक विद्वानों, शोधकर्ताओं और शिक्षकों का सक्रिय मंच है, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य कर रहा है; दूसरी है राष्ट्र सेविका समिति, 1936 में नागपुर में लक्ष्मीबाई केलकर द्वारा स्थापित, यह संगठन महिलाओं को संगठित कर राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका सुदृढ़ करता है; और तीसरा है शरण्या, 2016 में स्थापित, यह स्वयं स्वयंसेवी संस्था है जो विशेषकर दिल्ली की झुग्गी झोंपड़ी बस्तियों में काम कर रहा है। शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक जागरण के माध्यम से यह वंचित वर्ग की महिलाओं को सशक्त बना रही है।
 

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