बचपन का मोटापा: प्यार से कहा गया 'मोटा' शब्द कैसे बच्चे के आत्मविश्वास को तोड़कर बन जाता है मानसिक घाव

चाइल्डहुड ओबेसिटी: जब आपका 'मोटा' कहना बच्चे के लिए बन जाए मानसिक ट्रॉमा


नई दिल्ली, 3 मार्च। अक्सर हम बड़े लोग बिना सोचे-समझे बच्चों को 'मोटा', 'छोटा हाथी' या 'गोलू-मोलू' जैसे शब्द कह देते हैं। हमें लगता है कि ये तो बस मज़ाक है, प्यार से कहा गया नाम है, इसमें बुरा मानने जैसा क्या है? लेकिन सच ये है कि बच्चे इन शब्दों को मजाक की तरह नहीं लेते। उनके लिए ये शब्द धीरे-धीरे दिल पर लगने वाली चोट बन जाते हैं।

चाइल्डहुड ओबेसिटी यानी बचपन का मोटापा सिर्फ शरीर पर दिखने वाला अतिरिक्त वजन नहीं है, बल्कि ये बच्चे के आत्मविश्वास, उसकी सोच और उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है। जब किसी बच्चे को बार-बार उसके वजन को लेकर टोका जाता है, तो वो खुद को दूसरों से अलग और कमतर समझने लगता है। स्कूल में दोस्त चिढ़ाते हैं, खेल में उसे आखिरी में चुना जाता है और कई बार तो टीचर भी अनजाने में ऐसी टिप्पणी कर देते हैं जो उसे अंदर तक आहत कर देती है। धीरे-धीरे बच्चा लोगों से दूर होने लगता है। वह कम बोलता है, कम हंसता है और कई बार अकेले रहना पसंद करने लगता है।

सबसे बड़ी बात ये है कि बच्चे अपने बारे में वही मानने लगते हैं जो वे बार-बार सुनते हैं। अगर उसे रोज कहा जाए कि वह 'सुस्त' है या 'आलसी' है, तो वह खुद को वैसा ही समझने लगता है। इससे उसका आत्मविश्वास टूटता है और कई बार वह डिप्रेशन या एंग्जायटी जैसी समस्याओं का शिकार भी हो सकता है।

मोटापे की वजहें कई हो सकती हैं, जैसे गलत खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, हार्मोनल बदलाव या पारिवारिक आदतें, लेकिन समाधान ताने देना या शर्मिंदा करना नहीं है। बच्चों को जज करने के बजाय समझने की जरूरत है। उन्हें हेल्दी लाइफस्टाइल और खेलकूद या हल्की शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रेरित करना चाहिए, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े और वो खुद को दूसरों से कम न समझें।
 

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