इंद्रजीत लंकेश: 'जय हिंद, जय सिंध' में जया प्रदा को निर्देशित करना फैन मोमेंट; बताई बंटवारे और प्रेम की मार्मिक कहानी

'जय हिंद, जय सिंध' में जया प्रदा को निर्देशित करना मेरे लिए एक फैन मोमेंट था: इंद्रजीत लंकेश


मुंबई, 1 मार्च। भारतीय सिनेमा समाज और इंसानी रिश्तों का आईना है। इस बीच फिल्म 'जय हिंद, जय सिंध' काफी चर्चाओं में है। यह फिल्म बंटवारे के दौर को दिखाती है, जिसमें प्यार, पहचान और एकता का संदेश है। फिल्म के निर्देशक इंद्रजीत लंकेश ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में बताया कि यह फिल्म सिर्फ एक पीरियड ड्रामा नहीं, बल्कि उन भावनाओं की कहानी है जो आज भी लाखों परिवारों की यादों में जिंदा हैं। उन्होंने फिल्म की सोच, कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव और भारतीय सिनेमा की बदलती दिशा पर विस्तार से बात रखी।

इंद्रजीत लंकेश ने कहा, '''जय हिंद, जय सिंध' की मूल भावना एक प्रेम कहानी है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि भारत विभाजन और सिंध से लोगों के पलायन की सच्ची घटनाओं से जुड़ी है। यह फिल्म दिखाती है कि मुश्किल समय में भी प्रेम और इंसानियत लोगों को जोड़कर रखती है।''

पीरियड ड्रामा को निर्देशित करना कितना चुनौतीपूर्ण होता है, इस सवाल पर लंकेश ने कहा, ''किसी भी फिल्म की सबसे कठिन कड़ी उसकी लिखाई होती है। अगर कहानी और रिसर्च मजबूत हो तो फिल्म बनाना आसान हो जाता है। सालों के अनुभव ने मुझे सिखाया है कि मजबूत स्क्रिप्ट ही फिल्म की नींव होती है। एक बार आधार तैयार हो जाए तो निर्देशन और प्रस्तुति स्वाभाविक रूप से बेहतर हो जाती है।''

उन्होंने फिल्म की स्टारकास्ट की भी सराहना की और कहा कि महेश मांजरेकर, छाया कदम, जरीना वहाब, और जया प्रदा जैसे अनुभवी कलाकारों के साथ काम करना फिल्म के लिए बड़ी ताकत साबित हुई, वहीं नए कलाकारों ने भी शानदार प्रदर्शन किया।

जया प्रदा और महेश मांजरेकर जैसे दिग्गज कलाकारों को निर्देशित करने के अनुभव को लेकर इंद्रजीत लंकेश ने कहा, ''जया प्रदा को हम बचपन से फिल्मों में देखते आए हैं, इसलिए उन्हें निर्देशित करना मेरे लिए किसी फैन मोमेंट से कम नहीं था। वहीं, महेश मांजरेकर के काम की मैं लंबे समय से प्रशंसक रहा हूं। खास तौर पर फिल्म 'अस्तित्व' की कहानी आज भी प्रासंगिक लगती है। उनके साथ काम करना सम्मान की बात रही।''

हिंदी सिनेमा और दक्षिण भारतीय सिनेमा के बीच तुलना को लेकर चल रही बहस पर इंद्रजीत लंकेश ने कहा, ''इस तरह की तुलना सही नहीं है। भारत की हर भाषा और हर फिल्म इंडस्ट्री की अपनी खूबसूरती और कहानी कहने की शैली है। दक्षिण भारतीय सिनेमा को पहचान 'बाहुबली' के बाद नहीं मिली, बल्कि उससे कई दशक पहले भी महान फिल्मकार शानदार काम कर रहे थे।''

इंद्रजीत ने के. बालचंदर, मणिरत्नम और गिरीश कर्नाड जैसे दिग्गजों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय सिनेमा हमेशा से समृद्ध रहा है। वहीं, रजनीकांत और कमल हासन जैसे कलाकारों ने सालों पहले ही भारतीय सिनेमा की गहराई दुनिया को दिखा दी थी। सिनेमा लोगों को जोड़ने का माध्यम है, न कि उन्हें बांटने का।

उन्होंने फिल्म के संदेश पर बात करते हुए कहा, "जय हिंद, जय सिंध' का मकसद प्रेम, एकता और सौहार्द को बढ़ावा देना है। आज के समय में जब समाज कई तरह की विभाजनों से गुजर रहा है, तब ऐसी कहानियां लोगों को साथ रहने और एक-दूसरे को समझने की प्रेरणा देती हैं।"
 

Similar threads

Latest Replies

Forum statistics

Threads
11,903
Messages
11,940
Members
20
Latest member
7519202689
Back
Top