कहीं घृत मंडल तो कहीं हीरे-मोती से सजते हैं भगवान, मकर संक्रांति पर इन मंदिरों में विशेष शृंगार

कहीं घृत मंडल तो कहीं हीरे मोती से सजते हैं भगवान, मकर संक्रांति पर इन मंदिरों में होते हैं विशेष शृंगार


नई दिल्ली, 11 जनवरी। देशभर में मकर संक्रांति का त्योहार 14 जनवरी को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति को देखते हुए मंदिरों में विशेष तैयारियां शुरू हो गई हैं।

मकर संक्रांति के दिन मंदिरों में विशेष भोग के अलावा, विशेष शृंगार भी किया जाता है, जो दर्शन करने आए भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देता है। आज हम मकर संक्रांति के दिन देश के कुछ बड़े मंदिरों में होने वाले मुख्य देवताओं के शृंगार के बारे में जानेंगे।

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में मकर संक्रांति पर विशेष स्नान और शृंगार किया जाता है। मकर संक्रांति के दिन बाबा को तिल के उबटन से स्नान कराया जाता है और भांग, तिल, गुड़ और सूखे मेवों से शृंगार किया जाता है। चांदी के मुकुट के साथ पीले और हरे रंग के वस्त्र भी पहनाए जाते हैं।

झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में मकर संक्रांति पर लाखों की संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मकर संक्रांति के मौके पर घृत मंडल शृंगार किए जाते हैं, जो देसी घी और कुछ औषधियों से बनाया जाता है। घृत मंडल को सात दिनों तक शिवलिंग पर रखा जाता है, जिससे यह औषधीय गुणों से युक्त हो जाता है। भक्तों का मानना है कि इस घृत से सभी प्रकार के चर्म रोगों से छुटकारा मिलता है।

केरल के सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा का विशेष रूप से शृंगार किया जाता है। इस विशेष शृंगार को 'तिरुवाभरणम' कहा जाता है, यानी 'शाही आभूषण'। मकर संक्रांति पर भगवान अयप्पा को हीरे और कीमती मोतियों से सजाया जाता है। विशेष शृंगार पूरे होने के बाद ही अयप्पा भक्तों को दर्शन देते हैं। ऐसा अद्भुत शृंगार साल में एक बार देखने को ही मिलता है।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर में मकर संक्रांति के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का विशेष शृंगार किया जाता है, जिसे 'मकर चौरासी वेश' कहा जाता है। इसमें तीनों मुख्य देवी-देवताओं के लिए विशेष मुकुट बनाया जाता है और वस्त्र भी जल में रहने वाले जंतुओं के रंगों जैसे होते हैं।

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी को मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष रूप से हल्के पीले, लाल और हरे रंगों की पोशाक पहनाई जाती है और भारी स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है। ठाकुर जी का ये रूप बसंत पंचमी के आगमन का रूप भी होता है, जिसे होली से जोड़कर देखा जाता है।
 

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