पैरों की झुनझुनी नींद छीन रही? इसे सामान्य न समझें, हो सकता है रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम का संकेत

लेटते ही पैरों में झनझनाहट? हो सकता है रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम


नई दिल्ली, 1 मार्च। रात का समय शरीर और दिमाग के आराम का होता है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यही समय सबसे ज्यादा बेचैनी लेकर आता है। जैसे ही वे बिस्तर पर लेटते हैं, पैरों में झनझनाहट, हल्की जलन और खिंचाव जैसी दिक्कतें शुरू होने लगती हैं। पैर हिलाने से थोड़ी देर राहत मिलती है, लेकिन रुकते ही फिर वही परेशानी शुरू हो जाती है। कई लोग इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह समस्या रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम हो सकती है।

विज्ञान के अनुसार, रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम का संबंध दिमाग और नसों से है। हमारे दिमाग में डोपामिन नामक रसायन मांसपेशियों की हरकत को नियंत्रित करने में मदद करता है। जब डोपामिन का संतुलन बिगड़ जाता है, तो शरीर की गतिविधियों पर असर पड़ता है। इसी वजह से पैरों को बार-बार हिलाने की इच्छा होती है। कुछ विशेषज्ञ इसे पार्किंसंस बीमारी से भी जोड़कर देखते हैं, क्योंकि इस बीमारी में भी डोपामिन की कमी पाई जाती है। हालांकि दोनों बीमारियां अलग हैं, लेकिन रासायनिक असंतुलन की भूमिका दोनों में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

इस समस्या के पीछे सिर्फ डोपामिन ही नहीं, बल्कि आयरन की कमी भी एक बड़ा कारण हो सकती है। आयरन हमारे खून के लिए जरूरी है, लेकिन यह दिमाग के कामकाज में भी अहम भूमिका निभाता है। अगर शरीर में आयरन कम हो जाए, तो डोपामिन का संतुलन प्रभावित हो सकता है। गर्भावस्था के दौरान कुछ महिलाओं में यह समस्या अस्थायी रूप से देखी जाती है।

रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम के लक्षण अक्सर धीरे-धीरे शुरू होते हैं। शुरुआत में हल्की झनझनाहट या बेचैनी होती है। समय के साथ यह बढ़ सकती है। यह परेशानी आराम करते समय ज्यादा होती है। जैसे ही व्यक्ति लेटता है या लंबे समय तक बैठता है, लक्षण उभर आते हैं। चलने-फिरने या पैरों को हिलाने से कुछ समय के लिए राहत मिलती है, लेकिन रात के समय यह बीमारी ज्यादा गंभीर हो जाती है, जिससे नींद बार-बार टूटती है। नींद पूरी न होने से दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन, और ध्यान की कमी महसूस हो सकती है।

डॉक्टर आमतौर पर लक्षणों के आधार पर इस स्थिति की पहचान करते हैं। खून की जांच कर आयरन का स्तर देखा जाता है। इलाज में जीवनशैली में बदलाव, नियमित व्यायाम, सोने का तय समय और कुछ मामलों में दवाइयों की मदद ली जाती है। कैफीन कम करना और सोने से पहले हल्का स्ट्रेच करना भी फायदेमंद हो सकता है।
 

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