शरद कुमार: बिहार के लाल ने रोशन किया देश का नाम, दो साल की उम्र में बाएं पैर में आई थी समस्या

शरद कुमार: बिहार के लाल ने रोशन किया देश का नाम, दो साल की उम्र में बाएं पैर में आई थी समस्या


नई दिल्ली, 28 फरवरी। बिहार में खेल के क्षेत्र में प्रतिभाओं की कमी कभी नहीं रही, लेकिन सरकारी उदासीनता और सुविधाओं के अभाव की वजह से खिलाड़ी बड़े स्तर तक पहुंच नहीं पाते हैं और अगर पहुंच भी जाते हैं तो उनका प्रदर्शन साधारण रह जाता है। शरद कुमार की कहानी इससे अलग है। बिहार के इस सपूत ने वैश्विक मंच पर देश का नाम रोशन किया है।

शरद कुमार का जन्म 1 मार्च 1992 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हुआ था। दो साल की उम्र में, एक स्थानीय पोलियो उन्मूलन अभियान में नकली पोलियो दवा लेने की वजह से उनके बाएं पैर में पैरालिसिस हो गया। शरद और उनके परिवार के लिए यह सदमे की तरह था, लेकिन इससे निराश होने की जगह शरद को उनके परिवार वालों ने खेल और पढ़ाई दोनों ही क्षेत्र में भरपूर अवसर दिए। शरद ने दोनों ही क्षेत्र में अपने परिवार के भरोसे पर खड़ा उतरते हुए बड़ी सफलता हासिल की है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में विशेषज्ञता के साथ राजनीति में स्नातकोत्तर शरद पैरा-एथलीट हैं। वह ऊंची कूद में विशेषज्ञता रखते हैं। अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत उन्होंने 2010 में ग्वांगझू में एशियाई पैरा खेलों से की थी।

पूर्व वर्ल्ड नंबर वन शरद ने 2016 समर पैरालिंपिक में भारत को रिप्रेजेंट किया और छठे स्थान पर रहे। उन्होंने 2017 वर्ल्ड पैराएथलेटिक्स चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता। इसके बाद उन्होंने 2020 टोक्यो पैरालिंपिक में भारत को रिप्रेजेंट किया, जहां उन्होंने कांस्य मेडल जीता। उन्होंने 2024 पेरिस पैरालिंपिक में भी भारत को रिप्रेजेंट किया और रजत पदक जीता। शरद ने पेरिस में 2024 समर पैरालिंपिक के लिए भी क्वालीफाई किया था।

शरद ने 2014 में इंचियोन और 2018 में जकार्ता में हुए पैरा गेम्स में स्वर्ण पदक जीता था। 2018 के पैरा एशियाई खेलों में 1.90 मीटर की छलांग लगाकर उन्होंने एक नया गेम रिकॉर्ड और कॉन्टिनेंटल रिकॉर्ड बनाया था।
 
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