स्टॉकहोम सन्न! जब खुले आसमान के नीचे, बिना सुरक्षा के चलते स्वीडन के प्रधानमंत्री को गोली मार दी गई

Olof Palme


नई दिल्ली, 27 फरवरी। स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम की उस रात सड़कों पर सामान्य सी रौनक थी। सिनेमा हॉल के बाहर लोग आ जा रहे थे। अचानक गोली चली और पति जमीन पर गिर पड़ा। आम सी भीड़ में शामिल ये शख्स बेहद खास था। ये स्वीडन के प्रधानमंत्री थे जो बिना किसी सुरक्षा घेरे, बिना बॉडीगार्ड के चलना पसंद करते थे। इनका नाम था ओलोफ पाल्मे।

28 फरवरी 1986 की रात लगभग साढ़े 11 बजे, ओलोफ पाल्मे अपनी पत्नी लिस्बेथ पामे के साथ “ग्रैंड सिनेमा” से फिल्म देखकर घर लौट रहे थे। वे अक्सर आम नागरिकों की तरह बिना सुरक्षा के घूमते थे—यह उनकी राजनीतिक शैली और स्वीडिश लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा माना जाता था। तभी एक हमलावर ने पास आकर पीछे से गोली मारी। पामे को सीने में गोली लगी और घटनास्थल पर ही उनकी मृत्यु हो गई, जबकि उनकी पत्नी घायल हुईं लेकिन बच गईं।

ओलोफ पाल्मे 1969 से 1976 और फिर 1982 से 1986 तक स्वीडन के प्रधानमंत्री रहे। वे वैश्विक स्तर पर एक मुखर और विवादास्पद नेता माने जाते थे। उन्होंने वियतनाम युद्ध में अमेरिका की आलोचना की, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और परमाणु हथियारों की होड़ का विरोध किया। उनकी स्पष्टवादिता ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी दिलाया और आलोचना भी।

हत्या के बाद स्वीडन शोक में डूब गया। यह घटना इसलिए भी चौंकाने वाली थी क्योंकि स्वीडन को लंबे समय तक एक शांत और सुरक्षित देश माना जाता रहा था। इस हत्याकांड की जांच दशकों तक चलती रही। कई संदिग्धों से पूछताछ हुई, एक व्यक्ति को दोषी ठहराया भी गया, लेकिन बाद में उसे सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया गया।

2020 में स्वीडिश अभियोजकों ने घोषणा की कि उन्हें संदेह है कि "स्टिग एंगस्ट्रॉम" नामक व्यक्ति, जिसे “स्कैंडिया मैन” कहा जाता था, इस हत्या के पीछे हो सकता है। हालांकि, वह 2000 में ही मारा जा चुका था, इसलिए मामला औपचारिक रूप से बंद कर दिया गया। भारत में 1934 में जनमा स्कैंडिया मैन एक ग्राफिक डिजाइनर था और बतौर गवाह पाल्मे केस से जुड़ा रहा हालांकि वो बार-बार बयान बदलता रहा था और इस वजह से शक के घेरे में आया, लेकिन जब तक पुख्ता तौर पर उसके खिलाफ बात बनी तो वही दुनिया से विदा हो गया।

ओलोफ पामे की हत्या ने स्वीडन की सामाजिक और राजनीतिक आत्मछवि को झकझोर दिया। एक ऐसा देश, जो आजाद ख्याली और भरोसे की संस्कृति पर गर्व करता था, अचानक संदेह और आशंका के दौर में पहुंच गया।
 

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