बाजार की पाठशाला: आखिर क्यों फीकी पड़ रही हीरों की चमक, सोने-चांदी की लगातार बढ़ रही मांग

बाजार की पाठशाला: आखिर क्यों फीकी पड़ रही हीरों की चमक, सोने-चांदी की लगातार बढ़ रही मांग


मुंबई, 26 फरवरी। हीरे सदियों से मानव इतिहास का हिस्सा रहे हैं। प्राचीन यूनानियों से लेकर आधुनिक दौर तक हीरे को मजबूती, वैभव और प्रेम का प्रतीक माना जाता रहा है। मशहूर 'कोहिनूर' हीरा तो आक्रमण, साजिश और सत्ता संघर्ष का केंद्र रहा है। शादी-ब्याह में हीरे की अंगूठी को 'हमेशा के लिए' का प्रतीक माना जाता है।

अब हालात बदलते दिख रहे हैं। पिछले दो साल में प्राकृतिक हीरों की कीमतें लगभग 26 प्रतिशत तक गिर गई हैं। वहीं, लैब में बनाए जाने वाले हीरे (लैब-ग्रोउन) 2020 के मुकाबले करीब 74 प्रतिशत तक सस्ते हो चुके हैं। महंगाई के इस दौर में इतनी बड़ी गिरावट असामान्य मानी जा रही है। लंदन के मशहूर हीरा बाजार हैटन गार्डन के एक जौहरी के अनुसार, "अभी हीरा खरीदना ठीक समय नहीं है। कुछ समय में यह और सस्ता हो सकता है।"

दुनिया की बड़ी हीरा कंपनी डी बीयर्स ने बताया कि 2024 की शुरुआत में उसके पास 2 अरब डॉलर का हीरा का स्टॉक था, जो साल के अंत तक भी नहीं बिक सका। कंपनी ने खदानों में उत्पादन 20 प्रतिशत तक घटा दिया है और उसकी मूल कंपनी एंग्लो अमेरिकन ने उसे बेचने का फैसला किया है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोना महामारी के बाद 'रिवेंज स्पेंडिंग' के कारण हीरों की मांग अचानक बढ़ी थी, और टली हुई शादियों और लग्जरी खर्च ने बाजार को उछाल दिया था, लेकिन अब वह मांग सामान्य हो चुकी है। चीन में आर्थिक सुस्ती, वैश्विक मंदी का डर और शादियों की संख्या में कमी भी कीमतों में गिरावट की बड़ी वजह है।

सबसे बड़ा बदलाव लैब-ग्रोउन हीरों का तेजी से बढ़ता बाजार है। पहले इन्हें बनाने में कई हफ्ते लगते थे, लेकिन अब कुछ ही घंटों में तैयार हो जाते हैं। इनकी उत्पत्ति (सोर्स) साफ होती है, इसलिए युवा ग्राहक इन्हें ज्यादा नैतिक और पर्यावरण के अनुकूल मानते हैं। आज ब्राइडल ज्वेलरी बाजार में करीब 45 प्रतिशत हिस्सेदारी लैब-ग्रोउन हीरों की है।

अमेरिका में एक कैरेट प्राकृतिक हीरे की औसत कीमत मई 2022 में 6,819 डॉलर थी, जो दिसंबर तक गिरकर 4,997 डॉलर रह गई। वहीं समान आकार का लैब-ग्रोउन हीरा 3,410 डॉलर से गिरकर सिर्फ 892 डॉलर तक पहुंच गया। सस्ते होने के कारण ग्राहक अब बड़े आकार के हीरे खरीद पा रहे हैं।

हालांकि, कुछ पारंपरिक जौहरी अब भी प्राकृतिक हीरों को बेहतर मानते हैं। उनका कहना है कि लैब-ग्रोउन हीरे 'बनाए' जाते हैं, उनमें इतिहास या दुर्लभता नहीं होती।

इतिहास बताता है कि हीरा उद्योग पहले भी झटके झेल चुका है। 18वीं सदी में ब्राजील में नए भंडार मिलने से कीमतें दो-तिहाई तक गिर गई थीं। बाद में दक्षिण अफ्रीका में खोज से भी बाजार हिला था, लेकिन मार्केटिंग और नए ग्राहकों ने उद्योग को संभाल लिया।

वहीं, सोने और चांदी की मांग लगातार बढ़ रही है और विशेषज्ञ इनमें निवेश की सलाह दे रहे हैं, तो वहीं हीरों की चमक फीकी पड़ने की वजह से लोग इसमें निवेश से कतरा रहे हैं, क्योंकि हीरों का बाजार एक 'भावनात्मक और कृत्रिम' मूल्य पर टिका है। अगर लोगों का भरोसा और चाहत कम होती है, तो इसकी चमक और फीकी पड़ सकती है।
 

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