नई दिल्ली, 26 फरवरी। गर्मियों की शुरुआत के साथ शरीर ठंडे पेय पदार्थों की तरफ भागता है। आपका सब कुछ ठंडा और ताजा पीने का मन करता है।
गर्मियों में शरीर के तापमान को सही रखने और स्वाद बढ़ाने के लिए छाछ का सेवन अधिक किया जाता है, लेकिन छाछ सिर्फ एक पेय पदार्थ नहीं है, बल्कि इसे पाचन को संतुलित करने और त्रिदोष वात, पित्त व कफ को समभाव में रखने वाला द्रव्य कहा गया है।
आयुर्वेद में छाछ को सबसे ज्यादा लाभकारी और गुणकारी माना गया है। अगर छाछ का सेवन सही समय, सही अनुपात में किया जाए तो यह शरीर के लिए औषधि का कार्य करता है। अगर छाछ का सेवन शरीर के दोषों को समझकर किया जाए तो यह पेट, अग्नि और संपूर्ण शरीर को स्वाभाविक संतुलन प्रदान करता है। अगर शरीर की प्रवृत्ति वात है तो छाछ के सेवन से पहले कुछ बदलाव की जरूरत होती है।
वात प्रवत्ति के लोगों को ठंडी छाछ के साथ एक चुटकी सेंधा नमक का सेवन करना चाहिए। इससे पेट से संबंधित परेशानियां नहीं होती हैं और पाचन भी दुरुस्त रहता है। कई लोगों को छाछ के सेवन के तुरंत बाद शौच जाना पड़ता है। ऐसे में काले नमक या सेंधा नमक के साथ सेवन करने से पेट की पाचन अग्नि दुरुस्त रहेगी।
अगर शरीर की प्रवृत्ति पित्त है तो छाछ को मिश्री के साथ लेना सही रहेगा। पित्त शरीर में गर्मी पैदा करता है। छाछ और मिश्री का सेवन शरीर को ठंडा रखने में मदद करता है। इससे पेट की जलन और बनने वाला अत्यधिक एसिड कम होता है और पाचन की क्रिया अच्छे से हो जाती है।
अगर शरीर की प्रवृत्ति कफ है तो छाछ में एक चुटकी सोंठ डालकर सेवन करना चाहिए। इससे छाछ पीने के तुरंत बाद कफ नहीं निकलेगा, गले की खराश और नाक भी बंद नहीं होगी। यह पाचन अग्नि को मंद होने से बचाएगा। आर्युर्वेद में स्पष्टता से कहा गया है कि छाछ या कोई भी पेय पदार्थ हर शरीर के लिए एक समान असरकारक नहीं होता है। अगर सही तरीके से पेय पदार्थ या किसी भी अन्य खाद्य पदार्थ का सेवन किया जाए तो खाना औषधि बन जाती है। इसलिए हमेशा अपने शरीर को पहचानने के बाद ही खाद्य या पेय पदार्थों का सेवन करें।