संघ की सच्चाई बताई मोहन भागवत ने: कोई नहीं समान, शाखाएं व्यक्ति निर्माण की अनमोल कार्यशाला, नहीं सैन्य संगठन

संघ की तुलना किसी से नहीं, शाखा व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला: मोहन भागवत


मेरठ, 21 फरवरी। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ की तुलना किसी से नहीं हो सकती, क्योंकि संघ जैसा कोई दूसरा है ही नहीं। संघ की शाखा एवं संचालन को देखकर कोई सोचता है कि संघ कोई पैरा मिलिट्री संगठन है, लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि संघ व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है और शाखा में व्यक्ति के हर पक्ष के विकास और निर्माण की प्रक्रिया को मूर्त रूप दिया जाता है।

उन्होंने कहा कि संघ स्थापना से पूर्व देश की परिस्थिति से आप सब परिचित ही हैं। डॉ. हेडगेवार जी का संबंध एवं संपर्क बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, अर्थात ऐसे सभी लोगों से था, जो उस समय देश की आजादी के आंदोलन के साथ-साथ देश में व्याप्त कुरीतियों से लड़ रहे थे और देश के भविष्य की चिंता कर रहे थे। ऐसे में इन सबका जो विचार था, वही डॉ. हेडगेवार जी का विचार था। अक्सर उनके चिंतन का विषय होता था कि हम बार-बार पराधीन क्यों हो रहे हैं? सभी के विचारों का एकमात्र आशय रहता था कि हम अपने स्व को भूल गए, जिस कारण हम बंट गए, अनेक कुरीतियां आईं, और कई असमानताएं समाज में व्याप्त हुईं। डॉ. हेडगेवार जी ने विचार कर निष्कर्ष निकाला कि समरस, संगठित, अनुशासित हिन्दू समाज ही सभी समस्याओं का समाधान है।

उन्होंने कहा कि भारत में जो भी निवास करता है, वह हिन्दू है। हमारे मत, पंथ और पूजा पद्धति अलग हो सकती हैं, लेकिन हम सब हिन्दू ही हैं। "हिन्दू" का मतलब जोड़ना, सबके हित के विषय में विचार करना और सबके कल्याण की कामना करना है। इतना ही नहीं, हम सम्पूर्ण धरती पर जीव-जन्तु, चर-अचर और ब्रह्मांड के कल्याण की कामना करते हैं। पिछले दो सौ वर्षों में भारत में जितने महापुरुष हुए हैं, उतने दुनिया के किसी भी देश में नहीं हुए। यह हमारे लिए प्रेरणा का विषय है।

सरसंघचालक ने कहा कि विविधता हमारे देश का स्वभाव रहा है, लेकिन हम इतिहास को देखें तो इन सबके बावजूद भी हम एक साथ मिलकर एक राष्ट्र में रह रहे हैं। हमारे पूर्वज जानते थे कि बाहर सुख मिलता नहीं, अंदर किसी ने खोजा नहीं। इसलिए आध्यात्मिक रूप से उन्होंने इस तत्व को समझा और कहा कि विविधता मिथ्या है और एकता सत्य है।

उन्होंने कहा कि संघ को सौ वर्ष पूर्ण हो गए। इन सौ वर्षों में संघ ने प्रतिबंध भी झेले, झूठे हत्या के आरोप भी लगे, राजनीतिक विरोध भी झेलना पड़ा, स्वयंसेवकों की हत्याएं भी हुईं और अत्यंत अभाव भी देखा; लेकिन स्वयंसेवकों की दृढ़ संकल्प शक्ति और असीम इच्छाशक्ति के चलते, अपने आप को बचाते हुए आज अनुकूलता के काल में हम आए हैं और स्वयंसेवक समाज जीवन के अनेक क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि शताब्दी वर्ष में हमने सोचा कि समाज के पास जाएं और संघ के विषय में बताएं। उन्होंने आह्वान किया कि संघ तो कार्य कर ही रहा है। आप सब समाज की सज्जन शक्ति हैं, आप भी राष्ट्र उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहें।

जिज्ञासा समाधान सत्र में सरसंघचालक ने अनेक प्रश्नों के उत्तर दिए। कम शिक्षा बजट व सर्वसुलभ शिक्षा के प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि बजट बढ़ाने का काम सरकार का है, लेकिन संघ का मत है कि शिक्षा सभी के लिए सुलभ हो। प्राचीन काल में भी आप देखते हैं कि समाज के सहयोग से अनेक विद्यालय चलते थे। आज भी हमें वैसे ही परस्पर सहयोग और संस्कार की आवश्यकता है, ताकि समाज बिना सरकारी सहायता के वंचितों को शिक्षित करे।

मोहन भागवत ने कहा कि एक अन्य प्रश्न समानता लाने के लिए एक राष्ट्र-एक शिक्षा तथा एक राष्ट्र-एक स्वास्थ्य नीति की आवश्यकता के संबंध में था। इस पर सरसंघचालक ने कहा कि एक शिक्षा नीति है, एक स्वास्थ्य नीति भी है और इसमें क्षेत्रीय आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए कुछ विषय जोड़ने की भी छूट है, लेकिन इसे लागू करना राज्यों का विषय है। इसलिए संघ का प्रयास है कि ऐसे विषयों पर एक राय बने और समाज में एकरूपता आए।

आदर्श मूल्यों के क्षरण से संबंधित प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि सबसे पहले मूल्य आधारित शिक्षा लागू करनी होगी। समाज को संस्कारयुक्त वातावरण देना होगा। समृद्धि होना अच्छी बात है, किन्तु वेदों में कहा गया है कि आप भरपूर कमाएं, लेकिन अपनी जरूरत के हिसाब से रखते हुए शेष समाज हित में प्रयोग करें।

उन्होंने कहा कि एक प्रश्न था—संघ सामाजिक समरसता पर कार्य कर रहा है, लेकिन आज भी राजनीतिक दल जाति देखकर टिकट देते हैं। इस पर मोहन भागवत ने कहा कि संघ इस क्षेत्र में अत्यंत गहनता से कार्य कर रहा है। जो भी तत्व समाज को विघटित करने वाले हैं, उनसे सावधान होना होगा और वे यह तभी करते हैं, जब समाज ऐसा होने देता है। इसलिए हमें अपने व्यवहार में समरसता लानी होगी।

उन्होंने यह भी कहा कि समाज का वातावरण बदलना होगा। यदि आप संघ को समझते हैं तो देखेंगे कि संघ में जाति विस्मरण होता है। ओटीटी पर प्रसारित होने वाली सामग्री से संबंधित प्रश्न पर उन्होंने कहा कि विषयवस्तु देखना हमारे विवेक पर निर्भर करता है। ओटीटी पर रामायण एवं हनुमान चालीसा भी उपलब्ध है।
 
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