चीख रही गंगा डॉल्फिन! राष्ट्रीय जलीय जीव के अस्तित्व पर मंडराता मौत का खतरा, क्या बचा पाएंगे हम

Ganga dolphin


नई दिल्ली, 20 फरवरी। भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव गंगा नदी डॉल्फिन, या प्लैटनिस्टा गैंगेटिका, जिसे स्थानीय भाषा में सुसु या सौंस भी कहा जाता है, आज अपने अस्तित्व के लिए गंभीर खतरे का सामना कर रही है। यह दुनिया की कुछ खास डॉल्फिन प्रजातियों में से एक है जो केवल ताजे पानी की नदियों में रहती है और मुख्य रूप से भारत, नेपाल और बांग्लादेश की नदियों में पाई जाती है।

आम समुद्री डॉल्फिन से एकदम अलग गंगा डॉल्फिन की लगभग 90 प्रतिशत आबादी भारत में ही रहती है। यह जलीय जीव अपनी जैविक जरूरतों को पूरा करने के लिए इकोलोकेशन यानी प्रतिध्वनि निर्धारण पर पूरी तरह निर्भर रहती है। यह मात्र 5 से 30 सेकंड के लिए ही सतह पर आती है, जिससे इसे देखना और अध्ययन करना काफी मुश्किल होता है।

गंगा डॉल्फिन जन्म के समय चॉकलेटी भूरे रंग की होती है और बड़े होने पर ग्रे-ब्राउन और चिकनी त्वचा वाली हो जाती है। नर मादा से छोटे दिखते हैं। मादा हर 2-3 साल में एक बार ही बच्चे को जन्म देती है। यह अकेले या अधिकतम मां-बच्चे के जोड़े में रहना पसंद करती है और समूह में नहीं घूमती।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार, गंगा नदी डॉल्फिन भारत का राष्ट्रीय जलीय पशु है जो इकोसिस्टम के लिए शानदार है। खास बात है कि यह नदी की सेहत का सूचक मानी जाती है।

जल प्रदूषण, इंडस्ट्रियल कचरे और कृषि रसायनों का नदियों में बहना, डैम और सिंचाई परियोजनाएं, मछली पकड़ने के जाल में फंसना और अवैध शिकार इसके लिए मुख्य खतरा है। पिछले कुछ दशकों में इसकी आबादी और वितरण क्षेत्र में भारी कमी आई है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) ने इसे ‘लुप्तप्राय’ श्रेणी में रखा है।

प्रदूषण से डॉल्फिन के शरीर में जहर जमा हो जाता है, जबकि डैम नदियों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट देते हैं, जिससे इनब्रीडिंग और इनके भोजन का सोर्स प्रभावित होता है। गलती से जाल में फंसकर या मीट-तेल के लिए शिकार से भी बड़ी संख्या में मौतें होती हैं।

भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के अनुसार, राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण 2021-23 में भारत में लगभग 6,327 नदी डॉल्फिन की गणना की गई, जिनमें गंगा, यमुना, चंबल, गंडक, घाघरा, कोसी, महानंदा और ब्रह्मपुत्र नदियों में पाई जाने वाली गंगा नदी डॉल्फिन और ब्यास नदी में पाई जाने वाली सिंधु नदी डॉल्फिन की अपेक्षाकृत कम संख्या शामिल है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इनकी संख्या सबसे अधिक थी, उसके बाद पश्चिम बंगाल और असम का स्थान था।

संरक्षण के प्रयासों में साल 1991 में बिहार में विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन सेंचुरी बनाई गई, जो 60 किमी लंबी है। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार, विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य बिहार के भागलपुर जिले में स्थित भारत का एकमात्र डॉल्फिन अभयारण्य है। यह 60 किमी लंबा संरक्षित क्षेत्र संकटग्रस्त गंगा डॉल्फिन की रक्षा करता है। यहां डॉल्फिन के अलावा घड़ियाल, ऊदबिलाव और कछुए भी पाए जाते हैं।

पर्यावरण मंत्रालय प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत राष्ट्रीय सीएएमपीए प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान के माध्यम से संरक्षण के लिए काम कर रहा है।
 
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