झारखंड हाईकोर्ट की दो टूक: अवैध संबंध के आरोप हों तो चाहिए ठोस सबूत, शक पर नहीं मिलेगा तलाक

झारखंड हाईकोर्ट का फैसला, अवैध संबंध के आरोप प्रमाणित न हो तो संदेह के आधार पर नहीं दे सकते तलाक


रांची, 20 फरवरी। झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि केवल शक या सामान्य आरोपों के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि अवैध संबंध जैसे गंभीर आरोपों को साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं।

यह मामला दो बच्चों वाले एक दंपती से जुड़ा है, जिनका विवाह दिसंबर 2011 में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। पति ने आरोप लगाया था कि विवाह के कुछ समय बाद उसकी पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध हो गया। उसके अनुसार वर्ष 2021 में पत्नी दोनों बच्चों, आभूषण और नगदी लेकर घर छोड़कर चली गई।

इन आरोपों के आधार पर पति ने गोड्डा जिला स्थित फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। इस अदालत ने 15 अक्टूबर 2022 को यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि लगाए गए आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।

परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए पति ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायाधीश अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा।

खंडपीठ ने कहा कि केवल संदेह या सामान्य आरोपों के आधार पर वैवाहिक संबंध विच्छेद की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने गौर किया कि कथित अवैध संबंध के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य, जैसे कॉल डिटेल रिकॉर्ड, दस्तावेज या किसी विशेष घटना का स्पष्ट उल्लेख, प्रस्तुत नहीं किया गया। ऐसे में गंभीर आरोप प्रमाणित नहीं माने जा सकते।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में सामान्य मतभेद, तकरार या पारिवारिक विवाद अपने-आप में ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं आते। तलाक जैसे गंभीर निर्णय के लिए आरोपों का स्पष्ट और प्रमाणिक होना आवश्यक है।
 
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