चीन का मेगा डैम: भारत के लिए खतरा या विकास की नई कहानी?
तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रहा दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर डैम। क्या यह भारत और बांग्लादेश के लिए बाढ़ और सूखे का सबब बनेगा?
चीन ने तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर डैम बनाना शुरू किया
नई दिल्ली 20 जुलाई: शनिवार, 19 जुलाई 2025 को तिब्बत के न्यिंगची शहर में एक ऐतिहासिक पल दर्ज हुआ। चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग ने यारलुंग जांगबो, जिसे भारत में ब्रह्मपुत्र नदी के नाम से जाना जाता है, पर दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर डैम की आधारशिला रखी।
यह परियोजना, जिसे दिसंबर 2024 में मंजूरी मिली थी, न केवल इंजीनियरिंग का चमत्कार है, बल्कि भारत और बांग्लादेश के लिए एक गंभीर चिंता का विषय भी बन गई है। इस डैम की लागत करीब 167.8 अरब डॉलर (लगभग 12 लाख करोड़ रुपये) है, और यह चीन के थ्री गॉर्जेस डैम को भी पीछे छोड़ देगा।
क्यों है यह डैम इतना खास?
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, यह मेगा प्रोजेक्ट पांच हाइड्रोपावर स्टेशनों का समूह होगा, जो हर साल 300 अरब किलोवाट घंटे से अधिक बिजली पैदा करेगा। यह बिजली 30 करोड़ से अधिक लोगों की वार्षिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। यह डैम हिमालय की गहरी घाटियों में बनाया जा रहा है, जहां ब्रह्मपुत्र नदी एक विशाल यू-टर्न लेकर भारत के अरुणाचल प्रदेश और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे सामरिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टिकोण से संवेदनशील बनाती है।
भारत की चिंताएं: ‘वाटर बम’ का खतरा
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस डैम को ‘वाटर बम’ करार दिया है। उनकी चिंता बिल्कुल जायज है। ब्रह्मपुत्र नदी पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश की जीवनरेखा है। यह नदी असम, अरुणाचल प्रदेश और बांग्लादेश की कृषि, मछली पालन और आजीविका को सीधे प्रभावित करती है। अगर चीन इस नदी के प्रवाह को नियंत्रित करता है, तो दो बड़े खतरे सामने आ सकते हैं:
- पानी की कमी: अगर चीन पानी रोकता है, तो अरुणाचल और असम में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है।
- बाढ़ का खतरा: अगर बांध से अचानक पानी छोड़ा जाता है, तो निचले इलाकों में भीषण बाढ़ आ सकती है, जो लाखों लोगों की जिंदगी को प्रभावित करेगी।
रणनीतिक खेल या विकास का दांव?
कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह डैम केवल ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि चीन की ‘डैम डिप्लोमेसी’ का हिस्सा है। तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर पहले से ही 11 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जिनमें जांगमू सबसे बड़ा है। लेकिन यह नया डैम अपनी क्षमता और आकार में इन सभी को पीछे छोड़ देगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह परियोजना चीन को भारत और बांग्लादेश पर रणनीतिक दबाव बनाने का मौका दे सकती है।
पर्यावरण पर क्या होगा असर?
ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बती पठार से निकलकर हिमालय की गहरी घाटियों से होकर बहती है। यह क्षेत्र भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील है, जहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट्स टकराती हैं। पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि इतना बड़ा प्रोजेक्ट नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर सकता है और तिब्बती पठार के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके अलावा, बांध के निर्माण से हजारों स्थानीय तिब्बतियों को विस्थापित होना पड़ सकता है, जैसा कि थ्री गॉर्जेस डैम के दौरान 14 लाख लोगों के साथ हुआ था।
तिब्बत के लोगों का विरोध
तिब्बत में स्थानीय लोग इस डैम का विरोध कर रहे हैं। उनके लिए यारलुंग जांगबो नदी केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि एक पवित्र नदी है, जिसे वे देवी दोर्जे फाग्मो का प्रतीक मानते हैं। तिब्बती पर्यावरण विशेषज्ञ टेंपा ग्याल्ट्सेन ने कहा, “चीन ने इस परियोजना के लिए तिब्बतियों से कोई सलाह नहीं ली। यह नदी हमारे लिए जीवन और आस्था का आधार है।” तिब्बत में पिछले एक साल से इस डैम के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन चीन के सख्त नियमों के बीच इनका कोई खास असर नहीं हुआ है।
भारत की रणनीति: सियांग बैराज का जवाब
चीन के इस कदम का जवाब देने के लिए भारत भी कमर कस रहा है। केंद्र सरकार ने अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी (ब्रह्मपुत्र का हिस्सा) पर एक बड़ा बैराज बनाने का प्रस्ताव रखा है। इसका मकसद नदी के प्रवाह को संतुलित करना और चीन के डैम से उत्पन्न होने वाले खतरों को कम करना है।
अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा, “हमें सियांग को जीवंत रखना है। अगर चीन पानी रोकता है, तो नदी का आकार छोटा हो सकता है, और अगर ज्यादा पानी छोड़ता है, तो बाढ़ का खतरा बढ़ेगा।” भारत और चीन के बीच 2006 में बने विशेषज्ञ स्तरीय तंत्र (ईएलएम) के तहत बाढ़ के मौसम में जलविज्ञान संबंधी जानकारी साझा की जाती है, लेकिन इस डैम के बाद यह व्यवस्था कितनी प्रभावी रहेगी, यह देखना बाकी है।
बांग्लादेश की चिंता
ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में जमुना के नाम से बहती है और वहां की कृषि और मछली पालन के लिए महत्वपूर्ण है। इस डैम के बनने से बांग्लादेश में भी जल प्रवाह और पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है। बांग्लादेश ने पहले ही इस परियोजना पर चिंता जताई है और अंतरराष्ट्रीय जल संधियों के अभाव में चीन पर भरोसा करना मुश्किल बताया है।
चीन का दावा: कोई नुकसान नहीं
चीन ने दावा किया है कि यह डैम निचले इलाकों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा, “हमने दशकों तक अध्ययन किया है और सभी सुरक्षा उपाय किए हैं।” हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ने अब तक कोई बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय जल संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है, जिसके कारण भारत और बांग्लादेश को उसकी मंशा पर संदेह है।
भविष्य की चुनौतियां और भारत की तैयारी
इस डैम के निर्माण से भारत को कई मोर्चों पर काम करना होगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को सैटेलाइट और ड्रोन के जरिए निगरानी बढ़ानी चाहिए, वैकल्पिक जल भंडारण पर ध्यान देना चाहिए और बांग्लादेश के साथ मिलकर संयुक्त जल नीति बनानी चाहिए। विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन भी चीन से ट्रांसबाउंड्री जल सहयोग बढ़ाने की अपील कर चुके हैं, लेकिन बीजिंग इसे ‘आंतरिक मामला’ बताकर टाल रहा है।
आगे क्या?
चीन का यह मेगा डैम भारत और बांग्लादेश के लिए एक बड़ी चुनौती है। यह न केवल जल सुरक्षा और पर्यावरण के लिए खतरा है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता को भी प्रभावित कर सकता है। भारत को अब कूटनीतिक, तकनीकी और रणनीतिक स्तर पर सक्रियता दिखानी होगी। क्या यह डैम वास्तव में विकास की राह खोलेगा या भारत के लिए ‘वाटर बम’ साबित होगा? यह सवाल समय के साथ ही जवाब देगा। लेकिन एक बात साफ है—यह परियोजना भारत-चीन संबंधों में एक नया तनाव पैदा करने जा रही है।
FAQs
चीन ने तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर डैम क्यों बनाना शुरू किया?
चीन का दावा है कि यह डैम तिब्बत की बिजली जरूरतों को पूरा करेगा और कार्बन तटस्थता के लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करेगा। हालांकि, विशेषज्ञ इसे रणनीतिक दबाव बनाने की नीति मानते हैं।
इस डैम से भारत और बांग्लादेश को क्या खतरा है?
यह डैम ब्रह्मपुत्र नदी के प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है, जिससे भारत और बांग्लादेश में सूखा या बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। यह कृषि, मछली पालन और पारिस्थितिकी तंत्र को करेगा।
ब्रह्मपुत्र नदी पर डैम का पर्यावरण पर क्या असर होगा?
यह डैम तिब्बती पठार के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है और भूकंप संवेदनशील क्षेत्र में जोखिम बढ़ा सकता है।
भारत इस डैम का जवाब कैसे दे रहा है?
भारत अरुणाचल में सियांग नदी पर बैराज बनाने की योजना बना रहा है और सैटेलाइट निगरानी बढ़ाने पर विचार कर रहा है।
क्या चीन ने इस डैम के लिए तिब्बतियों से सलाह ली?
नहीं, तिब्बत के लोग इस डैम का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि यह उनकी पवित्र नदी और संस्कृति को प्रभावित करेगा।
क्या करें अब?
चीन का यह मेगा डैम न केवल एक इंजीनियरिंग परियोजना है, बल्कि एक रणनीतिक चाल भी है, जो भारत और बांग्लादेश के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती है। भारत को अब कूटनीति, तकनीक और क्षेत्रीय सहयोग के जरिए इस खतरे का मुकाबला करना होगा। इस मुद्दे पर आपकी राय क्या है? क्या भारत को और सख्त कदम उठाने चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट्स में बताएं और इस खबर को शेयर करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस गंभीर मुद्दे के बारे में जागरूक हों।