दिल्ली, 20 अगस्त। आज लोकसभा का दृश्य किसी सड़क नहीं, बल्कि देश के सर्वोच्च विधायी निकाय का था, लेकिन हालात ऐसे बने कि सदन के अंदर कागजात उड़ रहे थे, आरोपों की बौछार हो रही थी और सदन की गरिमा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगता दिख रहा था। गृह मंत्री अमित शाह जैसे जाने-माने सख्त नेता के सामने आज विपक्ष इतना भड़क गया कि उन पर कागज के गोले तक फेंके गए। यह नज़ारा था तीन नए बिलों को पेश किए जाने को लेकर, जिन पर लोकसभा में बिल विवाद आज चरम पर पहुंच गया।
क्या हुआ आज सदन में? एक Minute-by-Minute Account
बुधवार को जब गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में तीन नए बिल पेश करने के लिए खड़े हुए, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि दिन का अंत इतना विवादास्पद होगा। ये बिल थे – भारतीय न्याय संहिता (द्वितीय) बिल, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (द्वितीय) बिल और भारतीय साक्ष्य (द्वितीय) बिल। लेकिन विपक्ष के लिए, ये सिर्फ बिल नहीं, बल्कि सरकार की एक साजिश थे।
जैसे ही शाह ने बिलों पर बोलना शुरू किया, विपक्षी सदस्यों ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया। आरोप लगे कि सरकार संसदीय प्रक्रिया को दरकिनार कर रही है। हालात तब और बिगड़े जब कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सदस्यों ने बिलों की प्रिंटेड कॉपी उठाई और सदन के अंदर ही उन्हें फाड़ना शुरू कर दिया। फटे हुए कागजों के साथ-साथ कुछ सांसदों ने उन्हें गोल बनाकर सदन में और सीधे तौर पर गृह मंत्री की ओर उछालना शुरू कर दिया। स्पीकर ओम बिरला लगातार सदन को शांत कराने की कोशिश करते रहे, लेकिन आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी।
आखिर ऐसा क्या है इन बिलों में? जिसने भड़काया विपक्ष को
यह सवाल हर किसी के दिमाग में है। दरअसल, इनमें से एक प्रस्तावित प्रावधान ने सभी की आंखें फेर दीं। इसके मुताबिक, अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई भी मंत्री किसी ऐसे अपराध में गिरफ्तार होता है या 30 दिन से ज्यादा की हिरासत में रहता है, जिसमें कम से कम पांच साल की सजा का प्रावधान है, तो उसे अपने पद से तुरंत हटना होगा।
विपक्ष की मुख्य आपत्ति यही है। उनका कहना है कि यह प्रावधान सीधे तौर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री और AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल को टारगेट करके बनाया गया है, जो ठीक इसी तरह के एक मामले में जेल में हैं। विपक्षी नेता इस पर जोर दे रहे हैं कि यह कानून “व्यक्तिगत सत्ता संघर्ष” के लिए बनाया जा रहा है, न कि राष्ट्रहित के लिए। उनका आरोप है कि सरकार संसद का इस्तेमाल निजी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कर रही है।
विरोध के बाद क्या हुआ फैसला? JPC का मतलब क्या है?
इतने जबरदस्त विरोध और हंगामे के बीच सरकार के सामने एक रास्ता निकालना जरूरी था। आखिरकार, तूफानी बहस के बाद, यह फैसला हुआ कि इन तीनों विधेयकों को सदन की एक Joint Parliamentary Committee (JPC) यानी संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया जाएगा।
JPC में सदन के सदस्यों का एक समूह होता है जो किसी विशेष मामले या बिल की गहन जांच करता है। इसका मतलब यह हुआ कि अब ये बिल सीधे पास नहीं होंगे। JPC इनकी हर धारा, हर प्रावधान की जांच करेगी, विशेषज्ञों और हितधारकों की राय लेगी और फिर एक रिपोर्ट संसद के सामने पेश करेगी। इसके बाद ही इन पर आगे की कार्रवाई होगी। यह एक तरह से विपक्ष की एक बड़ी जीत मानी जा रही है, जिसने तात्कालिक रूप से बिलों के पारित होने को रोक दिया है।