मध्य पूर्व संकट: भारत रहे सतर्क! अमेरिकी शक्ति पर रिपोर्ट की बड़ी चेतावनी, यूरोप का भ्रम छोड़ गढ़े अपनी स्वतंत्र नीति

मध्य पूर्व संकट के बीच भारत को अपनाना होगा बड़ा रणनीतिक नजरिया: रिपोर्ट


वाशिंगटन/नई दिल्ली, 3 मार्च। जैसे-जैसे मध्य पूर्व में क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रभाव सामने आ रहे हैं, भारत को बड़ा नजरिया अपनाना चाहिए और यह समझना चाहिए कि यूरोपीय रणनीतिक स्वायत्तता उसकी अपनी तुलना में स्वभावतः सीमित है।

भारत जब अपने आर्थिक संबंध बढ़ा रहा है, तो उसे यह भ्रम नहीं रखना चाहिए कि अगर उसकी स्वतंत्र विदेश नीति से अमेरिका और ब्रिटेन नाराज होते हैं तो यूरोप उसके बचाव में आएगा।

नई दिल्ली स्थित विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की एक रिपोर्ट में मंगलवार को कहा गया, “28 फरवरी 2026 की घटनाएं दिखाती हैं कि अमेरिका की अनियंत्रित शक्ति किसी भी क्षेत्र की स्थिरता के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से नई दिल्ली को अब अमेरिकी हस्तक्षेप की लगातार संभावना के लिए गंभीरता से तैयार रहना चाहिए, जैसा कि फ्रांस ने जनवरी 2025 में डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण के एक सप्ताह के भीतर करना शुरू कर दिया था।”

रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह के एकतरफा रवैये की जड़ें ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन से पहले मौजूद थीं, जब पूर्व अमेर‍िकी राष्‍ट्रपत‍ि जो बाइडेन के कार्यकाल के दौरान विदेश में रहने वाले खालिस्तानियों की मौत को लेकर भारत को एंग्लो-अमेरिकी प्रचार के माध्यम से अनुचित रूप से निशाना बनाया गया था।

रिपोर्ट में कहा गया, “जो आतंकवादी थे, वे पश्चिमी मीडिया में ‘नापसंद’ बन गए। जिस प्रकार हाल ही में ईरान के संदर्भ में अमेरिकी कार्रवाई का समर्थन करने वाले ईरानी निर्वासितों की एक सुनियोजित परेड दिखाई गई, उसी तरह भारत के आलोचकों को भी देश को बदनाम करने की अनुमति दी गई।”

रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक भाषण दिया, जिसकी अपेक्षाकृत सौहार्दपूर्ण शैली ने ध्यान आकर्षित किया, विशेषकर जब उन्होंने अमेरिका को यूरोप की संतान बताया।

रिपोर्ट में कहा गया है, "कुछ विश्लेषकों ने देखा कि रुबियो ने यूरोप के औपनिवेशिक विजय, संसाधन निकालने और दूसरी सभ्यताओं पर नस्ल के आधार पर पश्चिमी श्रेष्ठता के इतिहास का जोरदार जश्न मनाया। ऐसा लगता है कि उन्होंने यूरोप के सामने एक विकल्प रखा, पश्चिमी दबदबे को फिर से बनाने की अमेरिकी कोशिश में शामिल हो जाओ या बेकार हो जाने का जोखिम उठाओ।"

रिपोर्ट में कहा गया कि उनका संदेश गैर-श्वेत समाजों के अपने ही देशों में श्वेत वर्चस्व का संकेत देता था। यह अमेरिका की सीमाओं के भीतर विदेशी-विरोध का संदेश नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नव-औपनिवेशिक और नव-साम्राज्यवादी विस्तार का संकेत था। 19वीं सदी की “गनबोट कूटनीति” की वापसी जैसा।
 

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