नई दिल्ली, 27 अगस्त: एक दिग्गज निवेशक जो बाजार की नब्ज जानता है, अचानक खुलकर कह दे कि पूरा सिस्टम ही घोटाला है – छोटे निवेशक सिर्फ ठगे जा रहे हैं। शंकर शर्मा के इस बयान ने शेयर बाजार में तहलका मचा दिया है, और अब हर कोई सोच रहा है कि क्या वाकई भारतीय डेरिवेटिव मार्केट एक जाल है?
शंकर शर्मा भारतीय डेरिवेटिव घोटाला की ये बहस सोशल मीडिया पर एक पोस्ट से शुरू हुई, जहां ऑप्शन ट्रेडर आनंद सरकार ने अमेरिकी बाजार की तारीफ की और अपनी ज्यादातर पूंजी वहां शिफ्ट करने का ऐलान किया। शर्मा ने इस पर रिएक्ट करते हुए खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय डेरिवेटिव बाजार ऊंची लागतों की वजह से एक ‘कम्पलीट स्कैम’ है, जो रिटर्न्स को चट कर जाता है।
हमने जब इसकी पुष्टि के लिए शेयर बाजार के जानकारों और छोटे ट्रेडर्स से बात की, तो पता चला कि ये समस्या सालों से चली आ रही है, लेकिन अब ये छोटे निवेशकों की कमर तोड़ रही है। शर्मा के मुताबिक, ब्रोकर, एक्सचेंज और सरकार मिलकर सिस्टम को ‘लूट’ रहे हैं, जबकि अमेरिकी बाजार में ट्रेडिंग सुपर सस्ती है।
शंकर शर्मा ने क्या-क्या कहा?
हमने शर्मा के X पोस्ट को देखा, जहां उन्होंने साफ-साफ लिखा: “मैंने ये बात बहुत पहले कही थी: अमेरिका सुपर सस्ता है। भारतीय डेरिवेटिव बाजार अल्ट्रा हाई कॉस्ट की वजह से एक स्कैम है, जो रिटर्न्स को बुरी तरह घटा देता है। सिर्फ ब्रोकर, एक्सचेंज और सरकार पैसा कमाते हैं। बाकी सब ठन ठन गोपाल। क्या लूटा इन तीनों ने…” ये शब्द अब वायरल हो चुके हैं, और कई ट्रेडर्स इससे सहमत हैं। शर्मा, जो GQuant Investtech के फाउंडर हैं और बाजार में दशकों का अनुभव रखते हैं, अक्सर ऐसी बेबाक राय देते हैं। उन्होंने पहले भी बाजार की गिरावट पर चेतावनी दी थी, जैसे मार्च 2025 में उन्होंने कहा था कि अगले 4-5 सालों में निफ्टी से जीरो रिटर्न मिल सकता है। लेकिन ये बयान डेरिवेटिव मार्केट पर सीधा हमला है, जहां फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडिंग में लाखों छोटे निवेशक रोजाना शामिल होते हैं।
अमेरिकी vs भारतीय बाजार: कहां है फर्क?
आनंद सरकार ने शिकागो बोर्ड ऑप्शंस एक्सचेंज (CBOE) की तारीफ की, जहां लिक्विडिटी ज्यादा है, ट्रेडिंग कॉस्ट कम और जीरो डेज टू एक्सपायरी (0DTE) ऑप्शंस आसानी से उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया कि यूएई से इंटरएक्टिव ब्रोकर्स के जरिए ट्रेडिंग पर कोई इनकम टैक्स नहीं लगता। हमने तुलना की, तो पता चला कि अमेरिका में प्रति कॉन्ट्रैक्ट फीस महज 0.50 डॉलर (करीब 42 रुपये) होती है, जबकि भारत में GST, STT/CTT, SEBI चार्ज और स्टाम्प ड्यूटी जैसे कई टैक्स लगते हैं।
उत्तर प्रदेश के एक छोटे ट्रेडर ने हमें बताया कि 20 रुपये फ्लैट फीस वाले डिस्काउंट ब्रोकर्स का दावा है, लेकिन असल लागत ट्रेड वैल्यू के 0.1-0.2% तक पहुंच जाती है। हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स के लिए तो ये घाटे का सौदा है, क्योंकि छोटे मार्जिन पर रणनीतियां फेल हो जाती हैं। अमेरिकी बाजार में कम लागत से रिटर्न्स ज्यादा रहते हैं, जबकि यहां सिस्टम ही निवेशकों को चूना लगा रहा है।
छोटे निवेशकों पर क्या असर?
ये घोटाला जैसी स्थिति सबसे ज्यादा छोटे रिटेल निवेशकों को मार रही है। बाजार में 90% ट्रेडर्स डेरिवेटिव्स में घाटा खाते हैं, लेकिन ऊंची फीस से उनका नुकसान और बढ़ जाता है। एक मुंबई के ट्रेडर ने कहा, “हम जोखिम उठाते हैं, लेकिन हर ट्रांजैक्शन पर ब्रोकर और सरकार पैसा बनाते हैं – चाहे प्रॉफिट हो या लॉस।” शर्मा के बयान से कई ट्रेडर्स की भावनाएं उभरी हैं, जो महसूस करते हैं कि सिस्टम उनके खिलाफ है।
SEBI की रिपोर्ट्स से भी पता चलता है कि डेरिवेटिव वॉल्यूम रेकॉर्ड हाई पर है, लेकिन रिटेल पार्टिसिपेशन में 80% लोग घाटे में हैं। अगर लागत कम नहीं हुई, तो छोटे निवेशक बाजार छोड़ सकते हैं, जो पूरी अर्थव्यवस्था के लिए बुरा संकेत है। वहीं, संस्थागत निवेशक और बड़े प्लेयर्स फायदे में रहते हैं, क्योंकि उनके पास वॉल्यूम से कॉस्ट कवर करने की क्षमता है।
बाजार के विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
मैंने कुछ बाजार विशेषज्ञों से बात की, जो शर्मा की बात से सहमत हैं। एक ने कहा कि भारतीय एक्सचेंज जैसे NSE और BSE पर ट्रांजैक्शन फीस ज्यादा हैं, जो ग्लोबल स्टैंडर्ड से दोगुनी हैं। लेकिन कुछ का मानना है कि ये फीस बाजार की स्थिरता के लिए जरूरी हैं, जैसे फ्रॉड रोकने और रेगुलेशन के लिए। फिर भी, शर्मा का पॉइंट वैलिड है – अगर अमेरिका जैसे डेवलप्ड मार्केट्स में कम कॉस्ट से चल सकता है, तो भारत में क्यों नहीं? हाल ही में SEBI ने डेरिवेटिव रूल्स टाइट किए हैं, जैसे वीकली एक्सपायरी कम करना, लेकिन कॉस्ट पर अभी कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया।
आगे क्या हो सकता है?
ये बहस अब रेगुलेटर्स तक पहुंच सकती है। अगर छोटे निवेशकों का गुस्सा बढ़ा, तो SEBI को ट्रेडिंग फीस कम करने पर विचार करना पड़ सकता है। शर्मा जैसे दिग्गजों की आवाज से पहले भी बदलाव हुए हैं, जैसे 2023 में F&O रूल्स में संशोधन। लेकिन फिलहाल, ट्रेडर्स को सावधान रहने की सलाह है – रिस्क मैनेजमेंट पर फोकस करें, और अमेरिकी बाजार जैसे अल्टरनेटिव एक्सप्लोर करें।
शंकर शर्मा का ये बयान हमें सोचने पर मजबूर करता है कि बाजार सबके लिए फेयर हो या सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों का खेल। अगर आप भी ट्रेडिंग कर रहे हैं, तो क्या महसूस करते हैं कि कॉस्ट ज्यादा है? अपनी राय कमेंट्स में जरूर शेयर करें, और ऐसी मार्केट अपडेट्स के लिए जुड़े रहें – क्योंकि आपका पैसा आपकी जिम्मेदारी है।
डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिमों के अधीन है। बाजार में निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय अवश्य ले। उपरोक्त आर्टीकल एजुकेशन और इंफॉर्मेशन के उद्देश्य के लिए है।